शारदीय नवरात्र महिमा

शारदीय नवरात्र आश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से आरंभ होता है। नवरात्र मुख्य रुप से दो होते हैं। वासंतिक नवरात्र और शारदीय नवरात्र। वासंतिक नवरात्र चौत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से आरंभ होता है। इसमें भगवान विष्णु के पूजा की प्रधानता होती है। शारदीय नवरात्र में शक्ति की उपासना की प्रधानता होती है। दोनों प्रकार के नवरात्र में प्रतिपदा तिथि से नवमी तिथि तक व्रत धारण किया जाता है। सामान्य आस्तिक जन दोनों नवरात्रों की उपासना करते हैं। इस पर्व पर सभी वर्ण एवं जाति के लोग मां दुर्गा के नौ रूपों की उपासना करते हैं। देवी की उपासना करने वाले प्रतिपदा से नवमी तिथि तक व्रत करके दशमी तिथि में पारण करते हैं। कुछ लोग अन्न का त्याग कर देते हैं। कुछ एक समय का भोजन ग्रहण कर शक्ति की उपासना करते हैं।

बहुत से उपासक श्री दुर्गा सप्तशती का सकाम या निष्काम भाव से नवमी तिथि तक पाठ करते हैं अथवा योग्य ब्राह्मण द्वारा पाठ कराते हैं। नवरात्र का अनुष्ठान करने वाले जितने संयम नियम से शुद्ध रहते हैं उतना उन्हें पुण्य प्राप्त होता है। नव रात्रियों तक व्रत करने से यह नवरात्र व्रत पूर्ण होता है। नवरात्रि व्रत अनुष्ठान के प्रारंभ में पवित्र स्थान की मिट्टी से वेदी बनाकर उसमें जौ, गेहूं बोएं। फिर उनके ऊपर अपनी सामर्थ्य अनुसार सोने, चांदी, तांबे अथवा मिट्टी के कलश को विधिपूर्वक स्थापित करें।

कलश के ऊपर सोनेए चांदी, तांबे, मिट्टी, पत्थर अथवा चित्रमयी देवी दुर्गा की प्रतिमा की प्रतिष्ठा व स्थापना करनी चाहिए। नवरात्र के व्रत के आरंभ स्वस्तिवाचन-शांतिपाठ योग्य ब्राह्मण द्वारा कराएं एवं व्रत का संकल्प लेना चाहिए। तदोपरांत भगवती देवी दुर्गा की सोलह उपचार द्वारा पूजा करनी चाहिए।

गणपति की एवं वरुण कलश की उपचारों द्वारा पूजा करनी चाहिए। दुर्गा देवी की आराधना में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का पूजन तथा मार्कण्डेयपुराणान्तर्गत निहित श्रीदुर्गा सप्तशती का पाठ करना या ब्राह्मण द्वारा कराना चाहिए। देवी व्रत में कुमारी कन्या का पूजन परम आवश्यक होता है। इस अनुष्ठान में नवरात्र के प्रत्येक दिन दस वर्ष तक की एक कन्या का पूजन कर उसे भोजन-वस्त्र एवं दक्षिणा प्रदान करनी चाहिए अथवा नवरात्र की समाप्ति पर नौ कन्या के चरण धोकर उन्हें देवी रुप मानकर सत्कार करना चाहिए एवं मिष्ठान, भोजन-वस्त्र व दक्षिणा प्रदान करनी चाहिए।

शास्त्रानुसार एक कन्या के पूजन से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, दो की पूजा से भोग और मोक्ष कीए तीन कन्या की अर्चना से धर्म-अर्थ-काम त्रिवर्ग की, चार की पूजा से राज्य पद कीए पांच की पूजा से विद्या, छह की पूजा से कर्म की सिद्धि, सात की पूजा से राज्य की प्राप्ति, आठ की पूजा से संपदा और नौ कन्या पूजन से पृथ्वी के प्रभुत्व की प्राप्ति होती है। कुमारी कन्या पूजन में दस वर्ष तक की कन्याओं का पूजन होता है। दस वर्ष से ऊपर की कन्याओं को कुमारी पूजन में वर्जित किया गया है। शास्त्रानुसार दो वर्ष की कन्या कुमारी, तीन वर्ष की त्रिमूर्तिनी, चार वर्ष की कल्याणी, पांच वर्ष की रोहिणी, छह वर्ष की काली, सात वर्ष की चण्डिका, आठ वर्ष की शांभवी, नौ वर्ष की दुर्गा और दस वर्ष की सुभद्रा होती हैं।

आश्विनस्य सिते पक्षे नानाविध महोत्सवैः।
प्रसादयेयु श्रीदुर्गा चतुर्वर्ग फलार्थिनः।।

आश्विन शुक्ल पक्ष में विशेष महोत्सवों से भी श्रीदुर्गा जी की पूजा धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों फल देने वाली है। देवी पार्वती श्री शंकर जी से कहती हैं कि शरत्कालीन शारदीय नवरात्र पूजा जो भक्तिपूर्वक करते हैं, उन्हें मैं प्रसन्न होकर पत्नी, धन, ऐश्वर्य, आरोग्य तथा उन्नति प्रदान करती हूं।

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लोकेंद्र चतुर्वेदी ज्योतिर्विद