मानसिक स्वास्थ्य की चुनौती

वर्तमान काल यदि तकनीकी उपलब्धियों और चतुर्दिक विकास के लिए गर्व से याद किया जाता है तो दूसरी ओर चिंता , अवसाद और तनाव की विभीषिका को भी जन्म देने वाला साबित हो रहा है । सामाजिक संरचना में हो रहे परिवर्तन परिवार और विवाह जैसी संस्थाओं पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं । तीव्र सामाजिक और भौगोलिक गतिशीलता के फलस्वरूप रिश्तों के तार टूट रहे हैं और अकेलापन बढ़ रहा है । वैश्वीकरण की प्रवृत्ति ने जहां महत्वाकांक्षाओं का आकाश विस्तृत किया है, वहीं गलाकाट प्रतिस्पर्धा और असंतोष को भी जन्म दिया है । सब के लिए अवसरों की समानता के लक्ष्य से भारतीय समाज अभी भी बहुत दूर है । लोगों के बीच अविश्वास पनप रहा है तथा सामाजिक सहयोग और समर्थन का दायरा दिनोंदिन सिकुड़ता जा रहा है । हर तरह से अपने को समर्थ बनाने के लिए नैतिक अनैतिक किसी भी उपाय से अधिकाधिक संसाधन जुटाने का भारी दबाव लोग महसूस कर रहे हैं । बढ़ती मंहगाई और बेरोजगारी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से आम जन की वरीयताओं और समाधान की युक्तियों के चुनाव को प्रभावित कर रही है । समाज के एक बड़े हिस्से में विफलता, घुटन, क्षोभ और असंतोष की अनुभूतियां बढ़ रही हैं और सुख, शांति तथा प्रसन्नता के भाव लुप्त हो रहे हैं । विकास की अंतहीन दौड़ में जीवन की पूर्वनिश्चित व्यवस्थाएं विशृखलित हो रही हैं और नई व्यवस्थाएं बन नहीं सकी हैं । ऐसी स्थिति में मानसिक स्वास्थ्य एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है ।

हमें यह याद रखना होगा कि मानसिक स्वास्थ्य और आरोग्य व्यक्तिगत उन्नति और सामाजिक विकास और उत्पादकता को सुनिश्चित करने के लिए बेहद जरूरी है । एक समर्थ देश की कल्पना को साकार करने के लिए मानसिक रूप से सजग और स्वस्थ समाज भी होना चाहिए । यद्यपि विश्व स्वास्थ्य संघटन ने स्वास्थ्य को लेकर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के भेद की जगह समग्र स्वास्थ्य पर जोर दिया है, व्यवहार में शारीरिक स्वास्थ्य की ओर ही अधिक ध्यान दिया जाता रहा है। शारीरिक स्वास्थ्य से ही जुड़े रोगों के निदान और नियंत्रण के विशेष प्रयास होते रहे हैं । दर असल दोनों के बीच का भेद सापेक्ष है पर वास्तव में दोनों एक दूसरे से अभिन्न हैं । विशेषज्ञता के दौर में दोनों की राहें अलग सी होती गईं । ‘मन’ और ‘मानसिक’ को अभौतिक और अलौकिक मान कर उसके इर्द-गिर्द बहुत से भ्रम भी पसर गए और मानसिक रोगों की पहचान को लेकर अनेक तरह के विश्वास और विचार भी प्रचलित होते गए । इसी क्रम में उसके उपचार की अनेक विधियां भी विकसित हुईं । पाश्चात्य चिकित्सा में मनोरोगों को लेकर गम्भीर प्रयास हुए हैं और उनके स्वरूप और लक्षणों का दस्तावेजीकरण भी हुआ है, जिसे डी एस एम और आई सी डी दो प्रणालियों के रूप में जाना जाता है । इसके लिए सेकियेटरी की शाखा भी है, जिसमें एम डी की डिग्री भी मिलती है । साथ ही मनोविज्ञान विषय की क्लिनिकल और काउनसिलिंग की शाखाएं उपयोगी ज्ञान और अभ्यास का सृजन कर रही हैं । वैज्ञानिक शोध के आधार पर विभिन्न मानसिक विकारों या रोगों के उपचार की औषधियों तथा विभिन्न प्रकार की मनोचिकित्सा की विधियों की जानकारी मिल रही है ।

मानसिक स्वास्थ्य और मानसिक रोगों को समझने के लिए जैव-मनो-सामाजिक मॉडल की चर्चा की जाती है, जो कारणों और परिणामों की बहुलता की ओर ध्यान आकृष्ट करता है । शरीर में होने वाली जैविक प्रक्रियाएं, जिनमें मस्तिष्क में न्यूरो ट्रांसमीटर से होने वाले हार्मोन के स्राव समेत विभिन्न मस्तिष्क केंद्रों की खास भूमिका महत्वपूर्ण पाई गई है । इसी तरह जीवन की परिस्थितियों में होने वाले विभिन्न अनुभव ( जैसे – सुख, हानि, लाभ, दुःख, पीड़ा, आघात, वियोग, तनाव, त्रासदी ) , शारीरिक रोग, हिंसा, आक्रोश आदि से साबका होने पर मानसिक स्थिति असंतुलित हो उठती है । अत्यधिक गर्मी या सर्दी जैसी भौतिक स्थितियां भी शरीर और मन दोनों को प्रभावित करती हैं । एक प्रणाली के रूप में मानसिक , सामाजिक और भौतिक अनुभव एक दूसरे से जुड़े होते हैं और प्रभावित करते हैं । मानसिक रोगों के निदान और उपचार दोनों के लिए ही कारणों की यह बहुलता बहुत महत्व की है ।

मानसिक रोगों को लेकर अज्ञानतावश अनेक भ्रम और मिथ्या धारणाएं प्रचलित हैं, जिनके कारण लोग उपचार से बचते हैं और समय पर उपचार न होने से समस्या विकराल हो जाती है । भारत में मानसिक रोगों की समस्या तेजी से बढ़ रही है। एक अनुमान के अनुसार 2017 में पांच प्रतिशत जन संख्या मानसिक रोगों से ग्रस्त थी । एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार महानगरों के किशोरों में लगभग तेरह प्रतिशत किशोर अवसाद, चिंता और मादक द्रव्य सेवन की समस्याओं से जूझ रहे हैं । तनाव, शैक्षणिक दबाव, माता पिता की अपेक्षाएं, मित्र मंडली के दबाव इसके खास कारण पाए गए हैं । मुश्किल यह है समाज में उपचार की स्थिति नगण्य है । उपचार पाने वाले लगभग सत्रह प्रतिशत हैं, जब कि 83 प्रतिशत रोगियों को मानसिक उपचार नहीं मिल पाता है । मनोपचार की उपलब्धता की दृष्टि से 195 देशों में भारत का 154 वां स्थान है । मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का भार बढ़ता जा रहा है । मेंटल हेल्थ केयर ऐक्ट 2017 मानसिक स्वास्थ्य को अधिकार के रूप में स्थापित करता है ।

उसे ध्यान में रख कर 2918-19 में पांच मिलियन रुपये की राशि स्वीकृत हुई जो 19-20 में चार मिलियन ही गई और अभी भी वही है । महामारी के दौरान मानसिक स्वास्थ्य की चुनौती और बढ़ गई । अनुमानतः इसमें 20 प्रतिशत वृद्धि हुई है । उल्लेखनीय है कि जहां विकसित देशों में कुल स्वास्थ्य बजट का पांच से अट्ठारह प्रतिशत मानसिक स्वास्थ्य पर खर्च होता है, भारत में यह सिर्फ दशमलव शून्य पांच प्रतिशत (.05) । मानसिक स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बहुत ही कम है ( एक लाख की जन संख्या पर .75 साइकियाट्रिस्ट ! )और इसके शिक्षण – प्रशिक्षण के केंद्र भी देश में गिने चुने कुल 13 ही हैं । एक आकलन के अनुसार प्रतिवर्ष दो हजार, 700 साइकियाट्रिस्ट की जरूरत है, जब कि कुल सात सौ तैयार होते हैं । यह तब जब जनसंख्या पर नियंत्रण हो । वर्ष 1982 में नेशनल मेंटल हेल्थ प्लान शुरू हुआ था । आगे चल कर 1996-97 में डिस्ट्रिक्ट मेंटल हेल्थ प्रोग्राम द्वारा पुष्ट किया गया । इन योजनाओं के संचालन को ले कर हुए अध्ययन उत्साहवर्धक नहीं रहे हैं । संसाधनों के अभाव और मनोचिकित्सकों की अनुपलब्धता के बीच नब्बे मिलियन मानसिक रोगियों की देख रेख और चिकित्सा समस्या जटिल होती जा रही है ।

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अवसाद जैसे मानसिक रोग हृदयरोग , मधुमेह और कैंसर जैसे रोग के साथ भी प्रभावी हो उठते हैं और तमाम रोगों के प्रति संवेदनशील बना देते हैं । इसलिए मानसिक रोगों की उपेक्षा घातक होगी । इस दृष्टि से समाज में चेतना बढ़ाने और स्वस्थ जीवन शैली अपनाने की मुहिम जरूरी है । सरकार को भी अपनी रीति-नीति पर पुनर्विचार कर प्रभावी उपचार व्यवस्था और उस तक आम जन की पहुंच की व्यवस्था करनी होगी । स्वस्थ मन के साथ ही स्वस्थ समाज बन सकेगा ।

गिरीश्वर मिश्र