गैजेट्स तक न सीमित रखें बच्चों को, उनके हुनर को तराशकर सवारें उनका भविष्य

लखनऊः बदलते समय के साथ जिस तरीके से तकनीकी बढ़ती जा रही है, उसने हमारे जीवन जीने के तरीके को काफी आसान बना दिया है। बच्चों की पढ़ाई का तौर-तरीका भी अब लगभग पूरी तरह बदल गया है। गैजेट्स से घिरे बच्चे अब ऐसे-ऐसे कदम उठा रहे हैं, जिसे देख कर हर कोई हैरान है। पिछले दिनों कई किशोरों द्वारा हत्या जैसे जघन्य अपराध की घटना को अंजाम देने के बाद लोगों की चिंताएं काफी अधिक बढ़ गई हैं। इसी को लेकर इंडिया पब्लिक खबर के संवाददाता पवन सिंह चौहान ने शहर के मनोचिकित्सकों व लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों से बातचीत की और उनसे इसके कारणों, निदान व अभिभावकों की भूमिका को लेकर विशेष बातचीत की।

केजीएमयू के मनोचिकित्सक डाॅ. आदर्श त्रिपाठी का कहना है कि एक समाज के तौर पर हमारा यह सोचना और मानना अनिवार्य है कि सभी में अलग-अलग विशेषताएं और प्रतिभा होती है। किसी की आर्ट अच्छी है, तो कोई किसी विषय में टॉप कर रहा है। कोई खेल में अव्वल है, तो कोई संगीत का जादूगर है। हमारी शिक्षा व्यवस्था में सभी के लिए मौके हों, ऐसा सिस्टम तैयार होना चाहिए। आज की शिक्षा व्यवस्था में जो बच्चे पढ़ाई में अव्वल होते हैं उन्हीं को ज्यादा मान्यता मिलती है, बाकियों को कमजोर और सम्मानित भाव से नहीं देखा जाता। बहुत से बच्चे समाज और विद्यालय के द्वारा अनदेखी, अपमानित होने पर निराश हो जाते हैं। इस कमी को समाज को दूर करना चाहिए और पढ़ाई के अलावा बच्चों को दूसरे क्षेत्रों में भरपूर अवसर मिलने चाहिए।

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डाॅ. त्रिपाठी का मानना है कि जब किशोर अवस्था में बच्चे निराश होते हैं, तो वह अपनी बौद्धिक क्षमता के अनुसार बहुत दूर की नहीं सोच पाते हैं। वह अपनी परेशानी का हल चाहते हैं, उसका परिणाम क्या होगा, वह इसके बारे में विचार नहीं कर पाते। अपनी समस्याओं का वह शाॅर्ट टर्म हल ढूंढते हैं। इसके अलावा मीडिया, गेम और फिल्मों में बड़ी से बड़ी हिंसा को बहुत ही सामान्य तौर पर दिखाया जाता है। इससे बच्चों में हिंसा के प्रति सोच बदल जाती है और वह हिंसा को सामान्य व्यवहार के तौर पर देखना शुरू कर देते हैं।

बच्चों में दिखे ऐसा व्यवहार, तो हो जाएं सतर्क –

अगर बच्चे के व्यवहार में अचानक कोई बड़ा बदलाव दिखाई दे, जैसे- बच्चा सबसे जल्दी न घुले-मिले और अकेले समय ज्यादा बिताने लगे तो सतर्क हो जाना चाहिए कि बच्चे की स्थिति सामान्य नहीं है। इसके अलावा जल्दी झुंझलाना, चिड़चिड़ापन, सामान्य सी बात को भी मानने से इंकार करने या उसका उल्टा करने, नशे की तरफ रूझान आदि लक्षण दिखते ही सतर्क हो जाना चाहिए।

रूचि और क्षमता को पहचानें –

परिवार को बच्चे पर किसी प्रकार का दबाव नहीं बनाना चाहिए। सिर्फ पढ़ाई के बारे में बात नहीं करनी है, बल्कि उसे पसंद आने वाली एक्टीविटी के साथ भी उसका हौसला बढ़ाना चाहिए। जरूरी नहीं है कि बच्चे की रूचि और क्षमता आपके अनुरूप हो, ऐसी स्थिति में बच्चे की क्षमता और रूचि को पहचानने की जरूरत है न कि किसी प्रकार के ताने देने की या पड़ोस के किसी बच्चे से उसकी तुलना करने की। इसी प्रकार का माहौल परिवार और समाज को बच्चे को देना चाहिए। सभी बच्चे क्लास में फस्र्ट नहीं आ सकते, सभी बच्चे खेल में अव्वल नहीं हो सकते, इसलिए बच्चे को उसकी अच्छाई और बुराई दोनों को स्वीकार करने की हिम्मत दिखाते हुए बच्चे का पालन-पोषण करना चाहिए।

  • पवन सिंह चौहान की रिपोर्ट

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