पांच सदी का रक्तरंजित संघर्ष, अब विराजेंगे रामलला

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राम की नगरी अयोध्या (Ayodhya) में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के विग्रह को गर्भगृह में स्थापित किये जाने की तैयारी जोर-शोर से चल रही है। एक ओर मन्दिर के प्रथम तल के अवशेष कार्य को समयबद्ध ढंग से पूरा कराया जा रहा है, तो दूसरी ओर देश के कोने-कोने और विदेश से आमंत्रित किये जाने वाले अतिथियों को निमंत्रण पत्र भेजे जाने और उनके आवास से लेकर जलपान और भोजन की रुपरेखा तैयार की जा रही है। राम जन्मभूमि मन्दिर ही नही सम्पूर्ण अयोध्या को 22 जनवरी के लिये न भूतो न भविष्यति की तर्ज पर भव्य और दिव्य बनाने की तैयारी में अयोध्या जिला प्रशासन, विहिप उसके अनुशांगिक संगठनों के साथ-साथ साधु संत व आमजन भी जुटे हुए है। पूरी अयोध्या में हर जगह सिर्फ रामलला की चर्चा है। शहर हो या गांव हर जगह रामोत्सव मनाने की होड़ लगती दिखाई पड़ रही है। कोई इसे सदियों से चल रहे संघर्ष पर हुई ’विजय’ का पर्व बता रहा है, तो कोई इसे राम भक्तों के सौगंध, ’’सौगंध राम की खाते है हम, मन्दिर वहीं बनायेगें’’ की पूर्णता का पर्व मान रहा है। सीधे और सपाट शब्दों में कहा जाय तो एक बार फिर पूरी अयोध्या राममय है।

22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का अवसर हिन्दू समाज को बहुत सहजता से नही मिला है। लगभग पांच सदी का प्रयास, शक्ति प्रदर्शन, 77 बार का संघर्ष, जिनमें अधिकांश रक्तरजिंत और अनगिनत आन्दोलनों के बाद हिन्दू समाज अपने आराध्य को जन्मभूमि पर निर्मित भव्य मन्दिर में पुर्नस्थापित करने का गौरव प्राप्त कर रहा है। 21 मार्च 1528 को मुगल शासक बाबर के आदेश पर उसके सेनापति मीर बाकी ने राम जन्मभूमि पर निर्मित मन्दिर को तोड़ कर बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया था। मुगल शासको के दबदबे के कारण कोई बड़ा युद्ध या जन आन्दोलन नहीं चला, लेकिन इतिहास बताता है कि इस मन्दिर को प्राप्त करने के लिए हिन्दू समाज सदैव संघर्ष और अपना जीवन बलिदान करता रहा। मंदिर तोड़े जाने के समय तत्कालीन भीटी नरेश महताव सिंह और हंसवार के नरेश रणविजय सिंह, रानी जयराज कुंवारी तथा राजगुरू पंडित देवीदीन पाण्डेय की अगुवायी में सेना ने पंद्रह दिन तक मुगल सेना से कड़ा संघर्ष किया।

हुमायूं के शासनकाल में दस बार हुए युद्ध में स्वामी महेशानन्द ने साधु संतों की सेना का नेतृत्व करते हुए युद्ध किया और शहीद हो गये। हंसवार की रानी जयराज कुंवारी ने महिला सैनिकों को लेकर युद्ध किया। अकबर के शासनकाल में बीस युद्ध हुए। अकबर ने बीरबल और टोडरमल की सलाह पर कथित मस्जिद के ढांचे के सामने एक चबूतरा बनवाकर उस पर श्रीराम का मन्दिर बनाने तथा बेरोकटोक पूजा करने की अनुमति दे दी। अत्याचारी औरंगजेब के शासनकाल में तीस युद्ध हुए, जिसमें अन्तिम युद्ध छोड़कर शेष में हिन्दुओं को विजय मिली थी। अकबर के शासनकाल में बना चबूतरा श्रीराम चबूतरे के नाम से विख्यात था, जहां श्रीराम की पूजा सदैव चलती रही लेकिन छह दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद के साथ ही इस चबूतरे का अस्तित्व समाप्त हो गया। औरंगजेब के बाद भी अवध के नवाबों के शासनकाल 1770 से 1857 तक आक्रमण और युद्ध होते रहे।

मुगलों और नवाबों के शासनकाल 1528 से 1853 तक मन्दिर मामले में हिंदू समाज बहुत मुखर और आन्दोलित नहीं हो पाया। परन्तु मुगलों और नवाबों का शासन कमजोर पड़ने तथा अंग्रेजी शासन के प्रभावी होने पर हिंदुओं ने भगवान राम के जन्मस्थान मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाने का मामला उठाया। इसको लेकर हिंदुओं और मुसलमानों में विवाद शुरु हो गया। इसी बीच 1858 में तत्कालीन ब्रिटिश प्रशासन के एक आदेश ने रामभक्तों सहित सिखों को भी आंदोलित कर दिया। अंग्रेज शासको ने विवादित भूमि पर तारों की एक बाड़ खड़ी करके कहा कि ढांचे के बाहर हिंदू पूजा करेंगे और भीतर मुस्लिम नमाज पढ़ेंगे।

हिंदुओं के साथ ही धर्म की रक्षा के लिए जान देने वाले निहंग सिखों को जब यह सूचना मिली तो उनका एक जत्था श्रीराम जन्मभूमि आ पहुंचा और विवादित ढांचे पर कब्जा जमाये लोगों को भगाकर स्वयं कब्जा जमा लिया। कहा जाता है कि निहंगों के इस जत्थे ने करीब डेढ़ माह तक कब्जा बनाये रखा। इस अवधि में निहंगों ने मन्दिर में पूजन-हवन करने के साथ ही विवादित ढांचे की दीवारों पर राम-राम लिख कर वहां धर्म के प्रतीक ‘निशान साहेब’ की स्थापना की। यद्यपि तत्कालीन प्रशासन ने 30 नवंबर 1858 को 25 निहंग सिखों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कराया। डेढ़ माह के बाद निहंगों ने विवादित ढांचा तो छोड़ दिया पर ढांचे के सामने अपना कब्जा बहुत दिन तक बनाये रखा। मस्जिद के बाहरी आंगन में स्थित राम चबूतरे पर बने अस्थायी मंदिर को पक्का बनाने और छत डालने के लिए निर्मोही अखाड़े के महंत रघुबीर दास ने 1885 में पहली बार फैजाबाद के दीवानी न्यायालय में अंग्रेजी सरकार के खिलाफ स्वामित्व को लेकर वाद दायर किया।

परन्तु न्यायालय से मंदिर को पक्का बनाने और छत डालने की अनुमति नहीं मिली। मुगल शासन की तरह अ्रंग्रेजी शासनकाल में भी हिन्दू समाज के साथ अन्याय होता रहा, लेकिन राम भक्त अनगिनत बार हुई हार और असंख्य बलिदानों के बाद भी कभी निराश नहीं हुए, वह नई ऊर्जा से जन्मभमि मुक्ति के लिये खड़े हो जाते। कभी सिक्ख समुदाय, कभी संत समाज तो कभी हिन्दू राम भक्तों ने राम जन्मभूमि मुक्ति की लड़ाई जारी रखी। आजादी से पहले 1914 में अंतिम बार खूनी संघर्ष हुआ, जिसमें हिन्दुओं ने इस्लामी ढांचे में तोड़-फोड़ करके अपना अधिकार जमा लिया। इस संघर्ष पर अंग्रेजी प्रशासन ने बड़े कठोर कदम उठाये, जिसके कारण मुस्लिमों का भी वहां नमाज पढना बंद हो गया। कहा जाता है कि बाबर के शासन काल से 1914 तक कुल 76 बार युद्ध हुए, जिसमें साढे तीन लाख राम भक्तों को अपने प्राणो की आहुति देनी पड़ी।

528 संतों ने लिया श्री राम जन्मभूमि मुक्ति का निर्णय

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आजादी के बाद 22-23 दिसंबर 1949 को जन्मभूमि पर रामलला की मूर्तियां अप्रत्याशित रुप से प्रकट हो गई। इस पर विवाद बढा तो तत्कालीन जिलाधिकारी केके नैय्यर ने ढांचे पर ताला लगवा दिया, लेकिन रामलला की दैनिक पूजा अर्चना हेतु एक सरकारी पुजारी को अनुमति दी गई। जनवरी 1950 में गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद के सिविल जज की अदालत में वाद दायर कर रामलला की प्रतिमाओं की पूजा-अर्चना के लिये अनुमति दिये जाने की मांग की। 05 दिसंबर 1950 को महंत रामचंद्र दास परमहंस ने भी सिविल जज के यहां वाद दायर करके मुस्लिम पक्ष को संबंधित स्थल पर पूजा-अर्चना में बाधा डालने से रोकने की मांग की। न्यायालय ने दोनो मामलों में मुस्लिम पक्षकारों को भगवान राम की पूजा-अर्चना में बाधा न डालने का आदेश दिया। राम जन्मभूमि मुक्ति के लिये चल रहे अलग-अलग प्रयासों के बीच अप्रैल 1984 में दिल्ली में आयोजित प्रथम धर्म संसद में सभी सम्प्रदायों के 528 संतों ने श्री राम जन्मभूमि की मुक्ति का निर्णय लिया।

यहीं से विश्व हिंदू परिषद इस आंदोलन में शामिल हुई। इस आन्दोलन से आम लोगों को जोड़ने के लिये विहिप द्वारा सीतामढी बिहार से ‘श्रीराम जानकी यात्रा’ प्रारम्भ की गई। इस यात्रा को फैजाबाद, लखनऊ होते हुए दिल्ली जाना था, लेकिन 31 अक्टूबर को इन्दिरा गांधी की हत्या के कारण यात्रा बीच में ही स्थगित कर दी गई। इसी बीच फैजाबाद के एक वकील उमेश चन्द्र द्वारा तत्कालीन जिला एवं सत्र न्यायाधीश केएम पांडे के यहां याचिका दायर करके राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद में दिसम्बर 1949 से बंद ताला खुलवाने के लिये अनुरोध किया गया। जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने 01 फरवरी, 1986 को ताला खोलने का फैसला दिया और आदेश के कुछ मिनटों बाद ही गर्भ गृह पर लगा ताला तोड़ दिया गया। यद्यपि उस समय केन्द्र और राज्य में कांग्रेस की सरकार थी।

इस घटना से मुसलमानों के साथ ही कांग्रेस में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से काफी नाराजगी भी हुई्र। मन्दिर का ताला खुलने के बाद श्रीराम जन्मभूमि पर मन्दिर निर्माण के लिये 1986 में ही विहिप द्वारा श्रीराम जन्मभूमि न्यास का गठन किया गया। 01 फरवरी, 1989 को प्रयागराज के कुंभ मेले में आयोजित संत सम्मेलन और तृतीय धर्म संसद में आये संतों द्वारा देश के हर मंदिर व हर गांव में रामशिला पूजन और 09 नवम्बर 1989 को श्री राम मन्दिर की आधारशिला रखने की घोषणा की गयी। शिलान्यास से पहले ही देश-विदेश से लगभग 2,75,000 पूजित रामशिलाएं अयोध्या पहुंच गईं। काफी विवाद और खींचतान के बाद प्रदेश में सत्तारुढ कांग्रेस सरकार की ओर से 09 नवंबर 1989 को श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर के शिलान्यास की अनुमति दी गयी। न्यास द्वारा बिहार के हरिजन कामेश्वर चैपाल से मन्दिर का शिलान्यास कराया गया।

कारसेवकों पर अमानवीय अत्याचार

इसी बीच 1989 में भाजपा ने अपने पालमपुर अधिवेशन में प्रस्ताव पारित कर अयोध्या आंदोलन का समर्थन किया। हरिद्वार में जब संतों द्वारा 30 अक्टूबर को अयोध्या में कारसेवा की घोषणा की गई तो तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने जनमत जुटाने के लिये सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा निकालने का निर्णय लिया। 25 सितम्बर 1990 को सोमनाथ से आडवाणी की रथयात्रा प्रारम्भ हुई, जिसमें आज के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी साथ थे लेकिन बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने समस्तीपुर में आडवाणी की यात्रा रोक कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। दूसरी ओर संतों, विहिप और भाजपा के आवाहन पर लाखों कारसेवक अपनी पत्नी, बच्चों के साथ अयोध्या के लिये प्रस्थान कर दिये। बिहार की तरह ही उ0प्र0 के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों को अयोध्या पंहुचने से रोकने के लिये पूरी सरकारी मशीनरी लगा दी।

अन्य राज्यों से प्रदेश में आने वाले सारे रास्ते बंद कर दिये गये। सड़क और रेल मार्ग से आ रहे कारसेवकों को गिरफ्तार करके अस्थाई जेलो में डाल दिया गया। उनके साथ ऐसे अमानवीय व्यवहार किये गये मानो वह समाज के क्रूर अपराधी हो। पुलिस की मार से किसी महिला का हाथ टूटा तो किसी बच्चे का सिर फूटा। अस्थाई जेलों में ठंड से कांपती वृद्ध महिलायें व अबोध बच्चे नंगी फर्श पर बैठा दिये गये। उनके खाने पीने की कोई व्यवस्था नही, उनके पास जो भी सामान था उन्हें पुलिस ने गिरफ्तारी के समय छीन कर फेंक दिया था। दुधमुहे बच्चे दूध और रोटी के लिये चिल्लाते रहे, तमाम लोगों की दवायें पुलिस ने छीन कर फेंक दी थी, जिससे उनकी हालत खराब होने लगी। पुलिस प्रशासन का खौफ ऐसा कि कोई उस ओर जाना तो दूर देखने की हिम्मत नही जुटा पा रहा था क्योंकि पुलिस निरंकुश हो गई थी, जिसे चाह रही थी उसे पकड़ कर अंदर कर दे रही थी। अखबार को भी प्रशासन ने अपनी भाषा में समझा दिया था।

यह हालात किसी एक स्थान पर नहीं अपितु प्रयागराज, बांदा, झांसी, चित्रकूट, वाराणसी, फैजाबाद, बाराबंकी, जौनपुर, बस्ती गोरखपुर जैसे उन सभी सीमावर्ती जनपदों के थे, जो किसी न किसी तरह अयोध्या से जुड़ रहे थे। कारसेवा में आने वाले अधिकांश कारसेवक दक्षिण भारत के थे, जो अपने परिवार के साथ आये और वह सब समाज के सम्मनित वर्ग से थे तथा उन्हें शायद यह लेश मात्र की कल्पना भी नही रही होगी कि उ0प्र0 की मुलायम सरकार उनके साथ ऐसा क्रूर और निर्दयतापूर्ण व्यवहार भी कर सकती है। प्रशासन के इस रवैये से विहिप व भाजपा के लोग परेशान होने लगे कि क्या करें ? हर तरफ हाहाकार की स्थिति। नेता से लेकर कार्यकर्ता तक परेशान। आखिरकार रामभक्तों पर हो रहे अत्याचार का मुकाबला करने लिये हिन्दू समाज जागृत हुआ। शहर से लेकर गांव तक जहां भी ऐसी स्थिति बनी लोग अपने घरों से दो-चार लोगों का भोजन, दूध, फल, कम्बल, कपड़े आदि लेकर अस्थाई जेल में बंद राम भक्तों के पास पंहुचने लगे। जागृत हिन्दू समाज का उत्साह और निडरता देखकर अधिकारी भी मूकदर्शक बनने को मजबूर हुए।

मुस्लिम तुष्टीकरण के लिये बर्बरता

प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव मुस्लिम तुष्टीकरण के लिये कारसेवकों पर न केवल बर्बर यातनाओं के आदेश दे रहे थे अपितु दंभ से कह रहे थे कि 30 अक्टूबर को अयोध्या में कारसेवक तो दूर परिन्दा भी पर नही मार सकता है। इसके लिये अयोध्या में कर्फ्यू लगा दिया गया। सरयू पुल पर कटीले तार लगाकर रास्ता बंद कर दिया गया। सरयू तट पर लगी नावों को उलट दिया गया और निषादों को मार कर भगा दिया गया ताकि कोई सरयू नदी के रास्ते अयोध्या न आने पाये, लेकिन प्रशासन के सारे प्रयासों के बावजूद बड़ी संख्या में कारसेवक भूखे, प्यासे, खेतों-झाड़ियों नदी नालों में 5-6 दिन तक छिपते-छिपाते अयोध्या पंहुचने में सफल हो गये। इन कारसेवकों की मदद और सुरक्षा में हर गांव और बस्ती के लोग तत्पर रहे। अयोध्या पंहुचे कारसेवकों को स्थानीय मन्दिरों और परिवारों ने आश्रय दिया। इतना ही नही कारसेवा की अगुवाई करने के लिये विहिप के तत्कालीन महामंत्री अशोक सिंहल के साथ श्रीश चन्द्र दीक्षित सारी बाधाओं के रहते हुए भी अयोध्या पंहुच गये।

सरकार के सारे दावों को दरकिनार कर कारसेवकों ने बाबरी ढांचे पर 30 अक्टूबर को भगवा फहरा दिया, लेकिन प्रशासन ने निहत्थे कारसेवकों पर लाठी और गोलियों की बौछार कर दी। कई कारसेवक मारे गये सैकड़ों की संख्या में लोग घायल हुए। सरकार के इस अत्याचार से रामभक्तों के उत्साह में कमी नहीं आयी और 02 नवम्बर को पुनः कारसेवा का निर्णय लिया गया। 02 नवम्बर 1990 का दिन हिन्दू धर्म के इतिहास में एक काला अध्याय है, जब भजन कीर्तन करते हुए कारसेवक जन्मभूमि की ओर बढ रहे थे तभी उनको चारों ओर से घेर कर गोलियां बरसा दी गई। बड़ी संख्या में कारसेवक मारे गये। मारे गये कारसेवकों की संख्या अबूझ पहेली बन कर रह गई क्योंकि सरकार ने आनन-फानन में तमाम कारसेवकों की लाश को गायब करवा दिया था। आजादी के बाद राम मन्दिर के लिये यह सबसे बड़ा हत्याकांड़ था।

इस घटना के बाद प्रदेश में मुलायम सरकार सत्ता से बाहर हुई और कल्याण सिंह के नेतृत्व में भाजपा सत्ता में आयी। अक्टूबर, 1992 में दिल्ली में आयोजित धर्म संसद में संतो और धर्माचार्यो द्वारा दिसंबर 1992 से पुनः कार सेवा प्रारंभ करने की घोषणा की गई। 06 दिसंबर 1992 को कारसेवकों ने अपमान के प्रतीक बाबरी ढांचे को ध्वस्त कर दिया। 07 दिसंबर, 1992 को जन्मस्थान पर एक लघु मंदिर बनाकर रामलला को स्थापित कर दिया गया। यद्यपि इस घटना के बाद कल्याण सिंह ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद से इस्तीफा दे दिया। यद्यपि बाद में केन्द्र सरकार ने देश में सत्तारुढ सारी भाजपा सरकारों को बर्खास्त कर दिया। बाबरी ढाचें के ध्वस्त होने के बाद शुरु हुई कानूनी लड़ाई लगभग 27 वर्षों तक चली। 09 नवंबर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय ने संबंधित स्थल को श्रीराम जन्मभूमि माना और 2.77 एकड़ भूमि रामलला के स्वामित्व की मानी। अन्य दावेदारों, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड के दावों को खारिज कर दिया गया।

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न्यायालय ने कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड विवादित भूमि पर अपना मालिकाना हक साबित नहीं कर पाया। न्यायालय ने कहा कि मंदिर निर्माण के लिए केंद्र सरकार तीन महीने में ट्रस्ट बनाए और ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े के एक प्रतिनिधि को शामिल करे। मुस्लिम पक्ष को मन्दिर से पांच कोस दूर वैकल्पिक रूप से मस्जिद बनाने के लिए 05 एकड़ भूमि किसी उपयुक्त स्थान पर उपलब्ध कराये जाने हेतु उ0प्र0 सरकार को आदेश दिया। सर्वोच्च अदालत के आदेश के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 05 फरवरी 2020 को अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की घोषणा की। ट्रस्ट गठन के 06 माह बाद 05 अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री के हाथों श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के लिए भूमिपूजन का कार्यक्रम हुआ।

लगभग साढ़े तीन वर्ष में बनकर तैयार राम मंदिर में रामलला का विग्रह विराजमान होने जा रहा हैं। इसी अवसर के लिये हिन्दू समाज के तमाम योद्धा लगभग 500 वर्षों तक संघर्षरत रह कर बलिदान होते रहे। इस अवधि के तमाम ऐसे लोग भी हैं, जिनके नाम तक किसी नहीं पता हैं। आजादी के बाद राम मन्दिर आन्दोलन को धार देकर अंजाम तक पंहुचाने वाले हिन्दू धर्म योद्धाओं की बात की जाए तो भी यह संख्या दहाई नहीं सैकड़े में है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विहिप सहित तमाम हिन्दू संगठनों के साथ भाजपा सहित अन्य राजनैतिक दलों से जुड़े कई वरिष्ठ नेताओं ने आन्दोलन में अहम भूमिका निभाई है। इन चर्चित चेहरों में कुछ का उल्लेख किया जाना प्रासंगिक होगा।-

1. देवरहा बाबा- श्रीराम मंदिर आंदोलन को धार देने वाले प्रमुख संतों में पूज्य देवरहा बाबा एक प्रमुख चेहरा थे। प्रयागराज में हुई धर्म संसद की अध्यक्षता देवरहा बाबा ने की थी, जिसमें 09 नवंबर 1989 को राम मंदिर के शिलान्यास की तारीख तय हुई थी। देवरहा बाबा का सार्वजनिक मंच पर आना उस समय की बड़ी घटना थी क्योंकि वह कभी सार्वजनिक स्थल पर नहीं जाते थे। उस समय सभी बड़ी राजनीतिक हस्तियां इनकी भक्त थीं। कहा जाता है कि बाबा के आदेश पर ही तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने पार्टी के विरोध को नजरअंदाज कर विवादित स्थल का ताला खुलवाया था और बाद में मन्दिर का शिलान्यास भी हुआ। सबसे आश्चर्यजनक यह है कि उन्होनें मृत्यु से कुछ समय पूर्व ही कहा था कि श्रीराम मन्दिर बनेगा।

2. स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती- ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन की अगुवाई करते रहे। प्रयागराज के संगम तट पर आन्दोलन से जुड़े जो भी कार्यक्रम हुए वह वासुदेवानंद जी के शिविर में ही हुए। आन्दोलन से जुड़ी तमाम घटनाओं का साक्षी स्वामी जी का शिविर रहा है। स्वामी जी की लोकप्रियता और जुझारुपन का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि जब 30 अक्टूबर 1990 की कारसेवा के लिये उन्होनें प्रयाग से प्रस्थान किया तो भीड़ देखकर प्रशासन के हाथ पैर फूल गये क्योंकि लाखों से अधिक कारसेवकों की संख्या और पांच किमी लम्बा जुलूस। बड़ी मुश्किल से स्वामी जी को प्रशासन मना पाया। स्वामी वासुदेवानंद श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्य है। फिलहाल, ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य की पदवी को लेकर एक विवाद न्यायालय में है।

3. महंत रामचंद्रदास परमहंस- अयोध्या के महंत रामचंद्रदास परमहंस वर्ष 1949 में विवाद शुरू होने से लेकर 1992 में बाबरी ढांचा के विध्वंस होने तक मुख्य भूमिका में रहे। 1984 में दिल्ली में हुई पहली धर्म संसद के अध्यक्ष रहे, जिसमें राम मंदिर निर्माण का प्रस्ताव लाया गया। उन्हीं की अध्यक्षता में श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन हुआ। हिंदू महासभा से जुड़े परमहंस जी 1989 में गठित राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष बनाये गये थे। अंत समय तक राम मंदिर निर्माण के लिए वह संघर्षरत रहे। 2003 में उनका निधन हो गया।

4. महंत नृत्य गोपाल दास- श्रीराम मन्दिर आन्दोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वाले संतों में एक नाम महंत नृत्य गोपाल दास का भी है। महंत जी इस समय श्री रामजन्मभूमि ट्रस्ट के अध्यक्ष है। विहिप की ओर से मन्दिर निर्माण के लिये फंड जुटाने से लेकर तमाम महत्वपूर्ण जिम्मेदारी इन्हें दी जाती रही है। विहिप से जुड़े होने और अग्रिम पंक्ति में रह कर सड़क से संसद तक प्रभावी पैरवी के कारण प्रदेश में काबिज रही सभी विरोधी दलों की सरकार में इनका उत्पीडन होता रहा है।

5. अशोक सिंघल- विहिप में महत्वपूर्ण पदों पर रहे अशोक सिंघल ने श्रीराम मंदिर आंदोलन में केंद्रीय भूमिका निभाई। मंदिर निर्माण आंदोलन चलाने के लिए संत समाज को जोड़ने और जनसमर्थन जुटाने में अशोक सिंघल की अहम भूमिका रही। हिन्दू संगठनों से जुड़े लोग कहा करते थे कि वह श्रीराम मंदिर आंदोलन के ‘चीफ आर्किटेक्ट’ थे। उन्हीं की अगुवाई में शिला पूजन, दिल्ली में धर्म संसद और समय-समय पर आयोजित विराट हिंदू सम्मेलनों ने राम मंदिर आंदोलन को नई धार दी। 1992 में बाबरी ढांचा विध्वंस मामले में अशोक सिंघल भी आरोपी बनाये गये थे। वह 2011 तक विहिप के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। मन्दिर पर निर्णय आने से पूर्व 17 नवंबर 2015 को निधन हो गया।

6. महंत अवैद्यनाथ- गोरक्ष पीठ के प्रमुख मंहत अवैद्यनाथ राम मन्दिर आंदोलन में अग्रिम पंक्ति के लोगों में शामिल थे। उनके प्रस्ताव पर 1984 की धर्म संसद में श्री राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन किया गया था। हरिद्वार के संत सम्मेलन में 30 अक्टूबर,1990 को मंदिर निर्माण शुरू करने प्रस्ताव उन्होनें ही रखा था। यह संयोग ही है कि 06 दिसंबर,1992 को मंदिर निर्माण के लिए कारसेवा शुरू करने का आह्वान भी उन्होंने ही किया था। बाबरी ढांचा विध्वंस मामले में इन्हें मुख्य आरोपी बनाया गया। गोरक्ष पीठाधीश्वर का 12 सितंबर 2014 को निधन हो गया।

7. उमा भारती और साध्वी ऋतम्भरा- मंदिर आंदोलन के दौरान जिन महिला संतो ने अपने ओजपूर्ण भाषणों से आम जनमानस को आन्दोलन से जोड़ा, उनमें उमा भारती और साध्वी ऋतम्भरा प्रमुख हैं। अयोध्या आंदोलन के दौरान साध्वी ऋतम्भरा के उग्र भाषणों के ऑडियो कैसेट पूरे देश में सुनाई दे रहे थे, जिसमें वे विरोधियों को ‘बाबर की औलाद’ कहकर ललकारती थीं। लिब्रहान आयोग ने बाबरी विध्वंस मामले में इन दोनो संतो की भूमिका को दोषपूर्ण माना था। इन पर भीड़ को भड़काने का आरोप लगा। उमा भारती केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री बनी।

8. लालकृष्ण आडवाणी- कट्टर हिन्दू छवि वाले भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने इस आंदोलन को राजनीतिक मुद्दा बनाने में सबसे अहम भूमिका निभाई थी। बीजेपी अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने 1990 में राम मंदिर निर्माण के लिए जनजागरण हेतु गुजरात से अयोध्या के लिए रथयात्रा निकाली थी। उनका लक्ष्य 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुंचना था, लेकिन 23 अक्टूबर को बिहार में लालू प्रसाद यादव की सरकार ने उन्हें रोक कर गिरफ्तार कर लिया। इस घटना के बाद भी कारसेवा में अपार जन समर्थन जुटाने में वह सफल रहे। 06 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा ढहाये जाते समय आडवाणी भी कारसेवकों के साथ थे। वह भाजपा, विहिप और बजरंग दल के अन्य नेताओं के साथ आंदोलन का नेतृत्व करते हुए मंच से भाषण दे रहे थे। चार्जशीट के अनुसार, आडवाणी ने छह दिसंबर 1992 को कहा था कि “आज कारसेवा का आखिरी दिन है।” आडवाणी के खिलाफ मस्जिद गिराने की साजिश का आपराधिक मुकदमा दर्ज किया गया था।

9. मुरली मनोहर जोशी- 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय आडवाणी के साथ मुरली मनोहर जोशी भी विवादित परिसर में मौजूद थे। वह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और वाराणसी, इलाहाबाद और कानपुर से सांसद रह चुके है। बाबरी विध्वंश मामले में डॉ. जोशी भी मुख्य आरोपी बनाये गये थे।

10. कल्याण सिंह- 06 दिसंबर 1992 को जब बाबरी ढांचा गिराया गया, तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह थे। जबकि कारसेवा से पहले उच्च न्यायालय में दाखिल एक वाद में कल्याण सिंह ने बाबरी ढांचे की सुरक्षा किये जाने का शपथ पत्र दिया था। ढांचा गिरने के बाद उन्होनें नैतिकता के आधार पर पद से त्यागपत्र दे दिया था। उन पर आरोप लगा कि प्रदेश के पुलिस और प्रशासन ने जान-बूझकर कारसेवकों को नहीं रोका। कल्याण सिंह का नाम उन 13 लोगों में शामिल था, जिन पर मस्जिद गिराने की साजिश का आरोप लगा था।

11. के. पराशरण- सर्वोच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता के पराशरण सर्वोच्च न्यायालय में हिन्दू पक्षकारों के अधिवक्ता रहे हैं। माना जाता है कि पराशरण की प्रभावी पैरवी के कारण ही श्रीराम जन्मभूमि का फैसला हिन्दुओं के पक्ष में आया। वर्तमान में पराशरण श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्य है। पूर्व की कांग्रेस सरकारों में अटार्नी जनरल भी रहे हैं। इन्हें पद्म भूषण और पदम विभूषण जैसे महत्वपूर्ण पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके है।

12. हामिद अंसारी- मुस्लिम पक्षकार हामिद अली बड़े चर्चित व्यक्ति थे। हिन्दू पक्षकार महंत रामचन्द्रदास परमहंस की तरह वह भी 1949 से ही बाबरी मस्जिद के सबसे प्रमुख पैरोकार थे। उनकी परमहंस से दोस्ती हमेशा चर्चा में रही। कहा जाता है कि दोनों लोग एक ही तांगे पर बैठकर न्यायालय जाते थे। परमहंस के साथ ही तमाम अन्य हिन्दू संतों से उनके संबंध थे। पहले साइकिल फिर दर्जी की दुकान चलाने वाले अंसारी 1961 में बाबरी मस्जिद के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से दायर मुकदमे में वादी थे। अंसारी ने ही 1986 में राजीव सरकार द्वारा ताला खोलने के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में मुकदमा किया। हामिाद अंसारी का 95 साल की आयु में 20 जुलाई 2016 को निधन हो गया।

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13. ददुआ- बुंदेलखण्ड इलाके में अस्सी और नब्बे के दशक में ददुआ के आतंक से पूरी सरकारी मशीनरी कांप उठती थी। बांदा और चित्रकूट के जंगलों में उसका एकछत्र राज था। सरकार करोड़ों खर्च करके भी उसका पता नही लगा पाती थी। अक्टूबर,1990 में जब राम भक्तों पर संकट आया तो ददुआ रक्षक बन कर सामने आया। दक्षिण से आ रहे कारसेवकों को बांदा जनपद के मानिकपुर स्टेशन पर उतारा जा रहा था। कुछ लोग पुलिस से बचने के लिये जंगलों में भाग गये। ददुआ को जब पता चला तो वह अपनी पूरी गैंग के साथ कारसेवकों की रक्षा में लग गया। सबको भोजन, जलपान कराने के साथ ही आर्थिक मदद की। महिलाओं व बच्चियों को अपने सुरक्षा घेरे में सकुशल वापस बांदा भेजा।

हरि मंगल

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