
नई दिल्लीः आचार्य चाणक्य ने अपनी पुस्तक ‘अर्थशास्त्र’ में जीवन के हर पहलूओं के बारे में विस्तारपूर्वक बताया है। आचार्य चाणक्य को कौटिल्य या विष्णुगुप्त के नाम से भी जाना जाता है। इनके पिता का नाम चणक था जिसके चलते उनको चाणक्य कहा जाने लगा। अपनी राजनीतिक विद्वता और महाज्ञान का कुटिल सदुपयोग, जनकल्याण तथा अखंड भारत के निर्माण जैसे सृजनात्मक कार्यो में करने के चलते वह कौटिल्य नाम से भी विख्यात हुए। उन्होंने अपनी नीतियों में व्यवहार, राजनीतिक विद्वता, रणनीति के साथ ही वाणी को खास महत्व दिया है। उन्होंने अपने एक श्लोक के माध्यम से यह बताया है कि कोयल से हमें वाणी की महत्ता को समझना चाहिए।
तावन्मौनेन नीयन्ते कोकिलश्चैव वासराः ।
यावत्सर्वं जनानन्ददायिनी वाङ्न प्रवर्तते।।
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इस श्लोक का अर्थ है जिस तरह कोयल मौन रहकर तब तक उस समय की प्रतीक्षा करती है, जब तक उसके कंठ से मधुर स्वर नहीं निकलते। क्योंकि कर्कश वाणी किसी को भी प्रिय नहीं होती और कोयल की मधुर वाणी ही सबको अतिप्रिय है। कोयल से हमें यह सीख लेनी चाहिए कि कर्कश और अप्रिय बोलने से अच्छा है मौन रहें और जब भी बोलें मधुर बोलें। मनुष्य के जीवन और उसके व्यवहार में वाणी का विशेष स्थान होता है। वाणी ही मनुष्य के व्यवहार का निर्धारण करती है। कोयल की वाणी सभी को कर्णप्रिय लगती है। लेकिन कोयल भी तब तक नहीं बोलती अर्थात मौन ही रहती है। जब तक कि उसके कंठ की वाणी मधुर नहीं हो जाती। इससे मनुष्य को यह सबक लेना चाहिए कि किसी को अप्रिय बोलने या कड़वा बोलने से बेहतर है कि शांत रहें और सही समय का इंतजार करें। मधुर वाणी से समाज में प्रेम का प्रभाव बढ़ता है। साथ ही व्यक्ति की प्रतिष्ठा भी बढ़ती है। वहीं कर्कश वाणी बोलने वाले मनुष्य को समाज में सदैव हेय दृष्टि से ही देखा जाता है। इसलिए किसी के लिए भी कड़वा बोलने से बेहतर है कि मौन रहें।
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