संयुक्त राष्ट्रः ढांचागत सुधारों की जरूरत

विश्वभर में प्रतिवर्ष 24 अक्तूबर को ‘संयुक्त राष्ट्र दिवस’ मनाया जाता है। 24 अक्तूबर 1945 को विश्व के 50 देशों ने मिलकर संयुक्त राष्ट्र अधिकार पत्र पर हस्ताक्षर कर संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन किया था। पिछले माह 26 सितम्बर को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 75वें सत्र को ऑनलाइन सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए भारत की दावेदारी की पुरजोर तरीके से वकालत करते हुए कहा था कि नई ताकतों को केन्द्रीय भूमिका में लाए बिना दुनिया की यह सबसे बड़ी पंचायत अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि संयुक्त राष्ट्र का ढांचा पुराना पड़ चुका है और इसकी स्थापना के समय जो परिस्थितियां थी, वे पुरानी पड़ चुकी हैं। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और पांचवीं श्रेणी की अर्थव्यवस्था के बावजूद भारत यूएन महासभा की निर्णायक प्रक्रियाओं में प्रमुख भूमिका में नहीं है तो इस संस्था का क्या लाभ?

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शांति और सुरक्षा बनाए रखने के उद्देश्य से प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् सन् 1929 में राष्ट्र संघ (लीग ऑफ नेशंस) का गठन किया गया था, जिसका उद्देश्य दूसरे संभावित युद्ध को रोकना था लेकिन 1930 के दशक में दुनिया के द्वितीय विश्वयुद्ध की ओर झुकाव को रोकने के उद्देश्य में राष्ट्र संघ काफी हद तक प्रभावहीन रहा। यही वजह रही कि द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् विजेता देशों ने मिलकर एक ऐसा संगठन बनाने का प्रस्ताव रखा, जो दुनिया भर में शांति कायम रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सके। इसी प्रस्ताव के आधार पर संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन किया गया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को अधिक समतापूर्ण और न्यायोचित बनाने के लिए एक ऐसे नए संगठन की स्थापना का विचार उभरा। यह विचार पांच राष्ट्रमंडल सदस्यों तथा आठ यूरोपीय निर्वासित सरकारों द्वारा 12 जून 1941 को लंदन में हस्ताक्षरित अंतर-मैत्री उद्घोषणा में पहली बार सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त हुआ। इस उद्घोषणा के अंतर्गत एक स्वतंत्र विश्व के निर्माण हेतु कार्य करने का आह्वान किया गया, जिसमें लोग शांति व सुरक्षा के साथ भयमुक्त वातावरण में रह सकें तथा निजीकरण एवं आर्थिक सहयोग के मार्ग की खोज कर सकें।

इस घोषणा के उपरांत 14 अगस्त 1941 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल तथा अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी. रूजवेल्ट द्वारा अटलांटिक चार्टर पर हस्ताक्षर किए गए, जिसे संयुक्त राष्ट्र के जन्म का सूचक माना जाता है। इसी चार्टर का समर्थन करने वाले 26 देशों ने 1 जनवरी 1942 को वाशिंगटन में संयुक्त राष्ट्र की घोषणा पर हस्ताक्षर किए। नवम्बर-दिसम्बर 1943 में अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट, ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल तथा सोवियत संघ के प्रधान स्टालिन ने तेहरान में मुलाकात कर संयुक्त राष्ट्र संगठन की स्थापना के लिए विभिन्न योजनाओं पर विचार-विमर्श किया, जो द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान मुख्य मित्र राष्ट्र नेताओं की प्रथम बैठक थी।

अगस्त से अक्तूबर 1944 के बीच सोवियत संघ, अमेरिका, चीन तथा ब्रिटेन के प्रतिनिधियों द्वारा वाशिंगटन के डम्बर्टन ओक्स एस्टेट में कई बैठकें आयोजित कर एक शांतिरक्षक विश्व संस्था बनाने की रूपरेखा तैयार की गई और उसी के आधार पर दुनिया भर के 50 देशों के प्रतिनिधियों के बीच 1945 में बातचीत हुई। द्वितीय विश्वयुद्ध के समाप्त होने के बाद 25 अप्रैल 1945 को अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं का एक संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन हुआ, जिसमें उपस्थित सभी देशों ने संयुक्त राष्ट्रीय संविधान पर हस्ताक्षर किए। 26 जून 1945 को सभी 50 देशों ने चार्टर पर हस्ताक्षर किए और सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी देशों के हस्ताक्षर के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ अस्तित्व में आया, जिसने 1929 में स्थापित राष्ट्र संघ के ढांचे और उद्देश्यों को अपनाया। 24 अक्तूबर 1945 से यह चार्टर प्रभावी हो गया, जिसके बाद से ही प्रतिवर्ष 24 अक्तूबर को ‘संयुक्त राष्ट्र दिवस’ मनाया जाने लगा।

संयुक्त राष्ट्र की संरचना में सुरक्षा परिषद वाले सबसे शक्तिशाली देश थे अमेरिका, फ्रांस, रूस तथा यूनाइटेड किंगडम, जिनकी द्वितीय विश्वयुद्ध में अहम भूमिका थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विजेता देश नहीं चाहते थे कि विश्व में फिर कभी द्वितीय विश्वयुद्ध जैसे हालात उत्पन्न हों। इसी सोच के चलते 1945 में ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ अस्तित्व में आया, जिसे अंतर्राष्ट्रीय संघर्ष में हस्तक्षेप करने के उद्देश्य से स्थापित किया गया। 1946 में प्रथम विश्वयुद्ध के बाद बने राष्ट्र संघ को भंग कर दिया गया। दरअसल संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व शांति स्थापित करने में इसलिए ज्यादा उपयोगी माना गया क्योंकि इसे शक्तियां प्रदान की गई कि वह अपने सदस्य देशों की सेनाओं को विश्व शांति के लिए कहीं भी तैनात कर सकता है। इसकी स्थापना के बाद शुरूआती दिनों में ही भारत भी इसके साथ जुड़ गया और धीरे-धीरे दुनिया के अन्य देश भी इसके साथ जुड़ते गए। 50 सदस्यों के साथ शुरू हुए संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य देशों की संख्या आज दुनियाभर में 193 हो चुकी है।

1945 में स्थापित संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्य उद्देश्य हैं युद्ध रोकना, मानवाधिकारों की रक्षा करना, सभी देशों के बीच मित्रवत संबंध कायम करना, अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को निभाने की प्रक्रिया जुटाना, सामाजिक एवं आर्थिक विकास, निर्धन तथा भूखे लोगों की सहायता करना, उनका जीवन स्तर सुधारना तथा बीमारियों से लड़ना। इन उद्देश्यों को निभाने के लिए 1948 में मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा प्रमाणित की गई। संयुक्त राष्ट्र का सबसे महत्वपूर्ण अंग है संयुक्त राष्ट्र महासभा, जो सभी सदस्य देशों का प्रतिनिधित्व करती है। इसी महासभा में हर तरह के अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा होती है और समस्याओं का समाधान निकाला जाता है। संयुक्त राष्ट्र का एक और महत्वपूर्ण अंग है संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शांति और सुरक्षा बनाए रखना जिसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है।संयुक्त राष्ट्र के अन्य महत्वपूर्ण अंगों में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय, संयुक्त राष्ट्र न्यास परिषद, आर्थिक एवं सामाजिक परिषद, संयुक्त राष्ट्र सचिवालय इत्यादि प्रमुख हैं।

विडम्बना है कि बीते 75 वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, अर्थव्यवस्था, हथियार, मीडिया, समाज, मुद्रा तथा समाज से संबंधित तमाम नीतियां इसके पांच स्थायी सदस्य देशों ब्रिटेन, अमेरिका, चीन, रूस तथा फ्रांस के राष्ट्रीय हितों के अनुरूप ही निर्धारित की जाती रही हैं। इसी कारण इस तरह की नीतियों का खामियाजा भारत के अलावा जापान, जर्मनी, आस्ट्रेलिया, इजरायल, दक्षिण कोरिया, ब्राजील, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात जैसे कई देशों को भुगतना पड़ा है, जो संयुक्त राष्ट्र महासभा की स्थायी सदस्यता के लिए तमाम मानदंडों को पूरा करने के बाद भी दशकों से स्थायी सदस्यता के लिए प्रयासरत हैं। यही कारण है कि प्रधानमंत्री ने भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाए जाने पर जोर देते हुए कहा कि भारत किस प्रकार इस संस्था में अपूर्व निर्णयों के बूते सदस्य देशों की संतुलित प्रगति का आधार बन सकता है लेकिन इसके लिए जरूरी है कि उसे इस संस्था का प्रमुख अंग बनाया जाए।

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चीन के आतंक समर्थित रूख को देखते हुए सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य अमेरिका भी चेतावनी भरे लहजे में संकेत दे चुका है कि संयुक्त राष्ट्र का औचित्य अप्रासंगिक हो रहा है और इसका पुनर्गठन जरूरी है। अमेरिका चेतावनी दे चुका है कि यदि चीन आतंकी संगठनों और उनके सरगनाओं को प्रोत्साहित करता रहा तो सुरक्षा परिषद के बाकी सदस्यों को नए कदम उठाने पर विवश पड़ सकता है। आने वाले समय में संयुक्त राष्ट्र के पुनर्गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है और भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के साथ सुरक्षा परिषद की सदस्यता के लिए मानदंडों पर खरा उतरने वाले अन्य देशों को भी इसमें पर्याप्त सम्मान मिलता है, तभी इस वैश्विक संस्था की प्रासंगिकता बरकरार रह पाएगी। सही मायनों में दुनिया की इस सबसे बड़ी पंचायत को अब गंभीर आत्ममंथन की जरूरत के साथ पर्याप्त सुधारों की भी सख्त दरकार है।

योगेश कुमार गोयल

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