यह पवार की गुगली है 

 

मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों शरद पवार का रूतबा कुछ इस कदर बढ़ गया है कि लगता है कि वे मुख्यमंत्री से ऊपर सुपर मुख्यमंत्री बन गए हैं। किसी भी समस्या में मुख्यमंत्री से ज्यादा सक्रियता दिखाकर वे यह जताने और बताने की कोशिश कर रहे हैं कि महाराष्ट्र में अभी भी उनकी तूती हो बोलती है। राज्य की महाविकास आघाडी सरकार के गठन से लेकर अब तक और आने वाले दिनों में भी शरद पवार का पावर कम नहीं होगा।

शरद पवार राज्य सरकार के लिए सेतु तथा संकटमोचन दोनों भूमिका में ही भूमिकाओं में है। शरद पवार की उपस्थिति में दशहरे से दो दिन पहले यानि 23 अक्टूबर को भाजपा के कद्दावर नेता एकनाथ खडसे राकांपा में शामिल हुए तो सवाल उठे कि आखिर शरद पवार ने एकनाथ खडसे को पार्टी में प्रवेश क्यों दिया। एक बागी तेवर के नेता और अति महात्वाकांक्षी एकनाथ खडसे भले ही आज यह कह रहे हों कि वे बिना किसी लोभ के राकांपा में शामिल हुए हैं, तो इसमें कोई तथ्य नहीं है, जो एकनाथ खडसे 40 वर्ष की लंबी राजनीतिक पारी में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को अपने पक्ष में नहीं कर पाए, क्या वहीं एकनाथ खड़से राकांपा में आने के बाद अपनी आदतें बदल देंगे।

शरद पवार की राकांपा में दिग्गज नेताओं की लंबी फौज़ है। इस फौज़ के कप्तान भले ही शरद पवार दिखते हों, लेकिन इस फौज़ में अच्छी खासी ताकत रखने वाला उपकप्तान अक्सर नाराज हो जाता है और वह कप्तान पर दबाब डालकर सब कुछ अपने अनुकूल करने की कोशिश करता है। शरद पवार की गणना राजनीति के चाणक्य के रूप में की जाती है, उनकी हर चाल शतरंज के खिलाड़ी की तरह होती है। शरद पवार राजनीति की  पिच पर अक्सर गुगली फेंकते रहे हैं, उनकी गुगली को खेल पाना हर किसी राजनेता के लिए संभव नहीं है। हर गुगली पर विकेट गिरे, यह जरूरी नहीं लेकिन इतना तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि हर गुगली खिलाड़ी को परेशान जरूर करती है। पिछले कई वर्षों से देवेंद्र फडणवीस से नाराज चल रहे एकनाथ खड़से ने आखिरकार शरद पवार की राकांपा का दामन खाम लिया है। एकनाथ खडसे के हाथ में अब राकांपा की घड़ी बंध गई है।

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कीचड़ से निकले कमल के सहारे अब तक अपनी राजनीति की वितरणी पार कराने वाले एकनाथ खड़से ने अपना राजनीतिक कुनबा बदल दिया है। पहले उनके राजनीतिक आका नरेंद्र मोदी थे, लेकिन अब उनके राजनीतिक आका शरद पवार हो गए हैं. शरद पवार ने अपने राजनीतिक कुनबे में भाजपा के अंसतुष्ट वरिष्ठ नेता एकनाथ खड़से को बड़े सम्मान के साथ क्यों लाया, इसके पीछे के राजनीतिक मायने क्या हैं, एकनाथ खडसे को राकांपा में लाने से एकनाथ खडसे तथा राकांपा को क्या फायदा होगा, क्या राकांपा ने एकनाथ खडसे को अपनी पार्टी में लाने के लिए उसी निकष का सहारा लिया, जिस निकष का सहारा लेकर भाजपा ने कांग्रेस के दिग्गज नेता नारायण राणे को भाजपा में प्रवेश दिया था।

भाजपा ने यह सोचकर नारायण राणे को पार्टी में स्थान दिया कि उनके आने से भाजपा को कोकण क्षेत्र में अपनी बढ़ाने का अवसर मिलेगा। कोकण नारायण राणे का गढ़ माना जाता है, ऐसे में भाजपा ने अपनी अगली राजनीतिक रणनीति के तहत नारायण राणे को पार्टी में शामिल किया। कुछ इसी तरह की रणनीति पर राकांपा ने भी काम किया। राकांपा ने एकनाथ खडसे को पार्टी में इसलिए स्थान दिया क्योंकि उत्तर महाराष्ट्र के धुले, नंदूरबार, जलगांव में राकांपा अपेक्षाकृत कमजोर है।

शरद पवार ने एकनाथ खडसे की दुखती रग को परखा और उनके हमदर्द बनकर उन्हें राकांपा में सम्मान से स्थान देकर एक तरफ जहां उनकी पार्टी कमजोर है, वहां अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश शुरु की, वहीं दूसरी ओर उन्होंने एकनाथ खडसे के माध्यम से उन लोगों को भी इशारों ही इशारों में समझा दिया है कि मैं अपने समर्थकों की सूची बढ़ा रहा हूं। कहा जा रहा है कि एकनाथ खड़से के बहुत से समर्थक आने वाले दिनों में राकांपा में शामिल होंगे।                 एकनाथ खडसे को हाथ पकड़कर भाजपा से बहर निकाल पाना किसी के लिए संभव नहीं था, वैसे देखा जाए तो एकनाथ खड़से का भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से कम राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री तथा वर्तमान में विधानसभा में विरोध पक्ष नेता देवेंद्र फडणवीस से टकराव ज्यादा था। देवेंद्र फडणवीस से टकराव के कारण एकनाथ खड़से का भाजपा को राम-राम कहना बहुत से लोगों को रास नहीं आया है। एकनाथ खडसे ने देवेंद्र फडणवीस के टकराव के कारण भाजपा छोड़कर मानो इस बात की पुष्टि ही कर दी कि देवेंद्र फडणवीस का कद भाजपा से भी ऊंचा है।

पार्टी बड़ी या नेता अगर यह सवाल किया जाए तो ज्यादातर लोगों का जबाब यही होगा कि पार्टी, लेकिन चाहे केंद्र सरकार हो  या राज्य सरकार अब नेता पार्टी से बढ़ा हो गया है। एकनाथ खडसे की देवेंद्र फडणवीस से जंग का नतीजा एकनाथ खडसे के भाजपा छोड़ने तक जाएगा, इससे बहुत से भाजपा नेता भी सहमत नहीं थे, लेकिन जब एकनाथ खड़से ने भाजपा का दामन छोड़कर राकांपा में प्रवेश किया तो भाजपा के वरिष्ठ नेता तथा पूर्व वनमंत्री सुधीर मुनगंटीवार को कहना पड़ा कि एकनाथ खड़से का भाजपा छोड़कर जाना दुर्भाग्यपूर्ण है।  पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा की ओर से एकनाथ खड़से को उम्मीदवारी नहीं दी गई, तभी एकनाथ खडसे को यह समझ लेना चाहिए था कि अब वे पार्टी के लिए जरूरी नहीं रह गए हैं। विधानसभा चुनाव में एकनाथ खडसे को उम्मीदवारी न मिलना ही इतना बताने के लिए काफी था कि आने वाले दिनों में भाजपा में एकनाथ खड़से की अहमियत कम होती जाएगी।

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एकनाथ खडसे उस संकेत को नहीं समझ पाए और देवेंद्र फडणवीस के खिलाफ लगातार बोलते चले गए, जिसका नतीजा हुआ कि न तो उन्हें राज्यसभा के लिए उम्मीदवार बनाया गया और न ही भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में उन्हें स्थान दिया गया, इसके बाद एकनाथ खडसे को इस बात पर पूरा यकीन हो गया कि अब भाजपा में रहना उनके लिए संभव नहीं होगा, लेकिन भाजपा को छोड़कर एकनाथ खड़से ने जिस राजनीतिक दल को थामा है, उसमें भी उनको बहुत ज्यादा सम्मान मिलने के आसार कम हैं। सच तो यह है कि शरद पवार अपने ही पारिवारिक कलह से परेशान हैं, उनके भतीजे और राज्य सरकार में उप मुख्यमंत्री अजित पवार, अजित पवार के पुत्र पार्थ पवार, रोहित पवार सभी के सूर शरद पवार के साथ नहीं हैं. कहा जा रहा है कि शरद पवार अपनी पुत्री सुप्रिया सुले को मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं, लेकिन अजित पवार इसके लिए तैयार नहीं हैं। शरद पवार इस बात से बखूबी परिचित हैं कि अजित पवार उनके लिए खतरनाक हो सकते हैं, इसलिए वे चाहते हैं कि जो-जो उनके साथ आना चाहता है, वह आ सकता है।

एकनाथ खड़से के बाद उनके समर्थकों की टोली अगर राकांपा का हिस्सा बन जाती है तो अगले चुनाव में शिवसेना के ज्यादा सीटें जीतने की स्थिति में राकांपा को मुख्यमंत्री पद की दावेदारी मिल सकती है, उस वक्त शरद पवार अपनी सुपुत्री को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजित कर सकते है। हालांकि आजित पवार के रहते शरद पवार का यह सपना पूरा होता नज़र नहीं आ रहा है। सीटों की लिहाज से देखा जाए तो शिवेसना तथा राकांपा में सिर्फ 2 का अंतर है और इसी अंतर को पाट कर शिवसेना के मुकाबले और मजबूत होने की कोशिश भी शरद पवार लगातार कर रहे हैं। अजित पवार के मुकाबले सुप्रिया सुले के समर्थक कम हैं, लेकिन जब सप्रिय सुले के साथ स्वयं शरद पवार जुड़ते हैं तो उनकी ताकत अजित पवार के मुकाबले और ज्यादा हो जाएगी, उस पर एकनाथ खड़से तथा उनके समर्थकों का राकांपा में आना और उससे शरद पवार मिलने वाली ताकत सुप्रिया सुले को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक ले जाने में सहायक सिद्ध हो सकती है।

देवेंद्र फडणवीस तथा एकनाथ खडसे के बीच के टकराव में शरद पवार का आना और एकनाथ खड़से को अपने दल में आश्रय देने के क्या मायने हैं, यह तो आने वाला समय बताएगा, लेकिन जहां तक एकनाथ खडसे की देवेंद्र फडणवीस के बीच की जंग से  राजनीतिक नफे-नुकसान का प्रश्न है, तो इस बारे में इतना ही कहना ठीक होगा कि राकांपा एकनाथ खडसे का इस्तेमाल अपनी ताकत बढ़ाने के लिए ज्यादा करेगी।

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संभव है कि आने वाले दिनों में एकनाथ खडसे को राकांपा का प्रदेशाध्यक्ष बना दिया जाए लेकिन राकांपा प्रदेशाध्यक्ष बनने के बाद अगर एकनाथ खड़से यह सपना देखेंगे कि उन्हें राकांपा की ओर से मुख्यमंत्री पद के लिए सामने लाया जाएगा, तो यह एकनाथ खड़से के लिए जागते हुए सपने देखने के आलावा कुछ और नहीं होगा, इसलिए राकांपा सुप्रिमो शरद पवार की गुगली पर भाजपा छोड़कर राकांपा में आए एकनाथ खड़से को यह बात अच्छी तरह से समझनी होगी कि 40 वर्ष में जो कुछ भी उन्होंने भाजपा में रहकर पाया था, वह राकांपा में पाना इसलिए संभव नहीं होगा क्योंकि पार्टी भले ही शरद पवार की हो, लेकिन उनकी पूरी मर्जी पार्टी में नहीं चलती और अगर राकांपा में बगावत हुई तो न तो पार्टी बचेगी और न ही एकनाथ खडसे का सपना।

राकांपा की स्थापना से लेकर अब तक उसके एक भी विधायक को मुख्यमंत्री बनने का अवसर नहीं मिला है, ऐसे में अगर आगामी विधानसभा चुनाव के बाद राकांपा सबसे बड़े दल के रूप में सामने आया, तो मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सबसे पहला नाम राकांपा नेता अजित पवार का ही होगा। भले ही शरद पवार सुप्रिया सुले का नाम सामने लांए, लेकिन मुख्यमंत्री पर पर ताजपोशी तो अजित पवार की ही होगी, तब एकनाथ खडसे यही कहते नज़र आएंगे कि न खुदा ही न मिला, न विसाले सनम, न इधर के रहे न उधर के हम।

सुधीर जोशी, महाराष्ट्र

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