स्वामी विवेकानन्द जयंती पर सपा करेगी ‘युवा घेरा कार्यक्रम’

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उत्तर प्रदेश में 2022 के चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी के दिमाग में है ऐसा  'सॉलिड' समीकरण | Such a 'solid' equation is on the mind of the Samajwadi  Party for the

 

 

लखनऊः समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री  अखिलेश यादव ने आगामी 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद जयंती को प्रदेश के हर जनपद में युवा घेरा कार्यक्रम के रूप में मनाने का आह्वान किया है। इस संबंध में बुधवार 6 जनवरी को अखिलेश यादव ने कहा कि स्वामी विवेकानंद की जयंती पर घेरा बनाकर युवाओं से संबंधित समस्याओं पर चर्चा होगी। इन चर्चाओं पर छात्रों-नौजवानों की सक्रिय भागीदारी होगी। इसके अलावा छात्रों-नौजवानों से संबंधित मुद्दों पर सार्वजनिक परिचर्चा और संगोष्ठियों का आयोजन करेगी। समाजवादी पार्टी के युवा प्रकोष्ठों के पदाधिकारी भी युवा घेरा कार्यक्रम में सक्रिय भागीदारी करेंगे।

अखिलेश ने कहा कि आज नौजवानों के सामने महंगी होती शिक्षा और रोजगार बड़ी समस्या है। जहां नौजवान सरकारी विसंगतियों के खिलाफ आवाज उठाते हैं, उनका उत्पीड़न शुरू हो जाता है। उन पर तमाम आरोप लगते हैं, फर्जी मुकदमों में फंसाया जाता है। युवाओं-छात्रों का भविष्य बिगाड़ने के लिए उन पर एनएसए भी लगा दिया जाता है। नौजवानों की जिंदगी के सामने आज अंधेरा छाया हुआ है।

भाजपा सरकार की कुनीतियों के चलते रोटी-रोजगार के अवसर कम हुए हैंैं। भाजपा सत्ता में नौजवानों को हर वर्ष 2 करोड़ रोजगार देने के वादे के साथ आई थी। उसके हर वादे की तरह यह वादा भी हवा-हवाई साबित हुआ है। प्रदेश में पूंजीनिवेश आया नहीं, नए उद्योग लगे नहीं, इच्छुक निवेशकर्ताओं को भी सरकार से उपेक्षा मिली और लाॅकडाउन में तो तमाम फैक्ट्रियां भी बंद हो गई। व्यापार चैपट हो गया। बड़े पैमाने पर श्रमिकों का पलायन हुआ। नौकरियों में छंटनी हुई। बेरोजगारी पर कहीं रोक नहीं लगी, सरकारी विभागों में रिक्तियां होने के बावजूद भर्तियां रूकी हुई है।

श्री यादव ने कहा कि भाजपा राज में सबसे ज्यादा असुरक्षित बहन-बेटियां हैं, जिनके साथ दुष्कर्म के कांड बढ़ते जा रहे हैं। छोटी-छोटी मासूम बच्चियां तक हैवानियत का शिकार बनाई जा रही हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में तो आरएसएस के जरिए राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते घोर अव्यवस्था के हालात पैदा हो गए हैं। नए नेतृत्व की नर्सरी छात्र संघों के चुनावों पर रोक लगी है।

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शिक्षा संस्थानों में एक खास विचारधारा को बढ़ावा दिया जा रहा है। शिक्षा संस्थाओं में अंधाधुंध फीस बढ़ाई जा रही है। कोरोना संकट में शिक्षा संस्थानों में बंदी की वजह से आॅनलाइन शिक्षा प्रारंभ करने का खूब समां बांधा गया है, लेकिन सच यह है कि इससे पढ़ाई कम, दिक्कतें ज्यादा बढ़ी हैं। स्मार्टफोन अथवा कम्प्यूटर के बिना यह पढ़ाई सम्भव नहीं, गांवों में नेट की समस्या के अलावा शिक्षण कार्य में भी असुविधा होती है। गरीब और मध्यम वर्ग के परिवार के लिए तो इस पढ़ाई में दिक्कत ही दिक्कत है। शिक्षा संस्थाओं में वाई-फाई सुविधाएं भी नहीं दी गई।