कागजों में सिमटी ‘नो ट्रिपिंग जोन’ की व्यवस्था

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आईपीके, लखनऊः राजधानी लखनऊ को नो ट्रिपिंग जोन बनाने की पहल बीते कुछ साल पहले ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा की ओर से की गयी थी। ऊर्जा मंत्री की पहल के बाद इस दिशा में विभाग ने तेजी भी दिखायी, मगर नो ट्रिपिंग जोन की दिशा में किया गया प्रयास सिर्फ कागजों तक ही सीमित दिखायी पड़ता है। राजधानी को नो ट्रिपिंग जोन बनाने की दिशा में न तो कोई ठोस कार्ययोजना बन पायी और न ही कोई गंभीर प्रयास ही दिखाई पड़े।

हालांकि बीते कुछ सालों की बात की जाए तो राजधानी लखनऊ की विद्युत आपूर्ति व्यवस्था पहले से कहीं अधिक बेहतर हुई है। नए सब स्टेशनों के निर्माण, विद्युत लाइनों और ट्रांसफार्मरों की क्षमता वृद्धि से काफी हद तक आपूर्ति व्यवस्था में सुधार हुआ है। मगर अभी भी शहर के आउटर इलाकों में ओवरलोडिंग, फाल्ट की समस्याएं सुचारू विद्युत आपूर्ति में बाधक हैं। विद्युत विभाग के जानकारों की मानें तो नो ट्रिपिंग जोन का मतलब ओवरलोडेड फ्री सिस्टम है, यानी सब स्टेशन, वितरण ट्रांसफार्मर, विद्युत लाइनों की ओवरलोडिंग पूरी तरह से खत्म हो। वहीं मध्यांचल विद्युत वितरण निगम के डायरेक्टर टेक्निकल सुधीर कुमार सिंह का कहना है कि तकनीकि रूप से देखें तो विद्युत आपूर्ति सिस्टम को नो ट्रिपिंग जोन की जगह ट्रिपिंग फ्री बनाया जाना चाहिए। उनके मुताबिक ट्रिपिंग नहीं होना विद्युत आपूर्ति सिस्टम के लिए सही नहीं है, बल्कि विद्युत आपूर्ति सिस्टम की मजबूती और बेहतरी के लिए फाल्ट होना अनिवार्य है। फाल्ट कम से कम हों, इस दिशा में काम करने की जरूरत है।

समय से मेंटीनेंस होना जरूरी

विद्युत आपूर्ति की ट्रिपिंग फ्री व्यवस्था लागू करने के लिए समय से मेंटीनेंस होना बेहद जरूरी है। एमवीवीएनएल के डायरेक्टर टेक्निकल सुधीर कुमार सिंह ने बताया कि विद्युत आपूर्ति कम से कम बाधित हो, इसके लिए प्री और पोस्ट मानसून को ध्यान में रखते हुए मेंटीनेंस कराया जाना चाहिए। समय से मेंटीनेंस कार्य न कराए जाने के चलते ही लोड बढ़ने पर विद्युत आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित होती है। जूनियर इंजीनियर से लेकर वितरण अभियंताओं की यह जिम्मेदारी है कि अपने विद्युत आपूर्ति सिस्टम का समय-समय पर मेंटीनेंस कराएं।

सही रेटिंग वाले लगे उपकरण

ट्रिपिंग फ्री व्यवस्था के लिए यह भी बेहद जरूरी है कि जो भी उपकरण लगाए जाएं वह सही रेटिंग वाले हों। जिन भी केबिलों का उपयोग किया जाए, उनकी गुणवत्ता बेहतर हो। दोयम दर्जे के उपकरणों की बजाय ऐसे सामानों का उपयोग किया जाए जो मानकों पर खरे हों। इससे आपूर्ति बेहतर होगी और लाइन लाॅस में भी कमी आएगी।

ट्रांसफार्मरों के लोड हों बैलेंस

विद्युत आपूर्ति व्यवस्था में फाल्ट के अलावा ट्रांसफार्मर फुंकना बड़ी समस्या है। गर्मियों के दिनों में राजधानी में ही बड़ी संख्या में ट्रांसफार्मर फुंक जाते हैं। इससे राजस्व का तो नुकसान होता ही है, विद्युत आपूर्ति बाधित होने से उपभोक्ताओं को भी परेशानी झेलनी पड़ती है। विभागीय जानकार बताते हैं कि ट्रांसफार्मर फुंकने की अहम वजह लोड बैलेंस न होना और ओवरलोडिंग है। ऐसे में 80 प्रतिशत ओवरलोडिंग होने पर ही ट्रांसफार्मरों की क्षमता वृद्धि कर ली जानी चाहिए।

छोटी लाइनें विद्युत आपूर्ति में कारगर

वितरण के लिए बनायी गयीं बड़ी-बड़ी बिजली लाइनें भी विद्युत आपूर्ति में बाधक बनती हैं। बेहतर विद्युत आपूर्ति के लिए छोटी लाइनें बनायी जानी चाहिए। हालांकि विभाग में न्यूनतम और अधिकतम विद्युत लाइनों के बनाने का मानक नहीं है। अधीक्षण अभियंता शक्ति भवन अनिल कुमार ने बताया कि 100 एम्पियर से कम के फीडर बेहतर माने जाते हैं। बड़ी लाइनों को स्विचिंग स्टेशन बनाकर छोटी लाइनों में बदला जा सकता है। इससे फाल्ट जैसी समस्या से काफी हद तक निजात मिल सकती है।

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रेवेन्यू और मेंटीनेंस के जेई हों अलग

ऊर्जा विभाग में राजस्व वसूली पहली प्राथमिकता है और उसके बाद ही अन्य चीजें आती हैं। निचले स्तर के अधिकारियों पर राजस्व वसूली का दबाव हमेशा रहता है। वहीं मौजूदा समय में जिस जूनियर इंजीनियर को मेंटीनेंस का कार्य देखना है उसी के जिम्मे रेवेन्यू वसूली भी है। विभाग की राजस्व वसूली और मेंटीनेंस का काम सुचारू तरीके से होता रहे, इसके लिए रेवेन्यू और मेंटीनेंस के जूनियर इंजीनियर की अलग पोस्ट थी। मगर बीते कुछ सालों में धीरे-धीरे यह पोस्ट समाप्त होती गयी। अब सब स्टेशन पर तैनात जेई को ही रेवेन्यू वसूलना है और मेंटीनेंस भी करवाना है। ऐसे में रेवेन्यू वसूली के चलते मेंटीनेंस व्यवस्था प्रभावित रहती है।