फकीर प्रधानमंत्री ही भारत को आगे ले जा सकता है

एक दल छोड़कर दूसरे दल में जाने वाले क्या कहते हैं, यह बहुत मायने नहीं रखता लेकिन इसकी गंभीरता और इससे उत्पन्न संदेशों को कमतर भी नहीं आंका जा सकता। रही बात संदेशों की तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश-दुनिया में इतने राजनीतिक संदेश दिए हैं कि अगर जनता उनका संस्मरण भर कर ले तो भी भाजपा को कोई चुनाव जीतने के लिए अतिरिक्त श्रम करने की जरूरत नहीं है।

पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पड़ोसी देश में एक हाथी भिजवा दिया था। वह इसलिए कि वहां के बच्चों ने पत्र लिखकर शिकायत की थी कि उन्होंने हाथी नहीं देखा है और वे दुनिया भर के बच्चों के चाचा हो गए थे। कुछ लोग थोड़ा करके भी बहुत अधिक पा जाते हैं और कुछ लोग बहुत करके भी फकीर के फकीर ही रह जाते हैं।

नरेंद्र मोदी के साथ भी कुछ ऐसा ही है। लाल किला की प्राचीर पर अपने संबोधन के बाद बच्चों से मिलते नरेंद्र मोदी को देखकर कौन नहीं कहेगा कि वे अपने देश के बच्चों से असीम प्यार करते हैं। आकाशवाणी पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों में वे किस तरह देश के बच्चों की परीक्षा, स्वास्थ्य आदि की चिंता करते हैं, उसके अपने राजनीतिक संदेश हैं।

प्रयागराज कुम्भ में सफाईकर्मियों के पैर पखार कर उन्होंने पूरी दुनिया को संदेश दिया कि सफाईकर्मियों का लोकजीवन में कितना महत्व है। हमें स्वच्छ और स्वस्थ रखने में सफाईकर्मियों का बड़ा योगदान है। कभी महात्मा गांधी ने मल-जल की टोकरी अपने सिर पर रखी थी। नरेंद्र मोदी ने सफाई कर्मियों को सम्मान देने और दिलाने की उस श्रृंखला को आगे बढ़ाने का काम किया था।

याद करें, 4 दिसंबर, 2016 को मुरादाबाद में दिया गया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वह संभाषण जिसमें उन्होंने कहा था कि देश से गरीबी हटाने के लिए यूपी, बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों का विकास जरूरी है। मैं यूपी से सांसद बनने के लिए नहीं लड़ा बल्कि गरीबी हटाने के लिए यहां से चुनाव लड़ा। न मेरा कोई नेताजी है, न हाईकमान है। मेरा जो कुछ है, आप ही लोग हैं। जनता ही मेरी हाईकमान है।हिंदुस्तान की पाई-पाई पर आप लोग का हक है। विरोधी लोग ज्यादा से ज्यादा मेरा क्या कर लेंगे? हम तो फकीर आदमी हैं। झोला लेकर चल पड़ेंगे। ये फकीरी है जिसने मुझे गरीबों से लड़ने की ताकत दी है।

यह और बात है कि चारा घोटाले के आरोपी लालू प्रसाद यादव ने इस पर चुटकी ली थी कि ऐसे कैसे झोला लेकर चल देंगे, हम जाम तलाशी लेंगे की झोली में ले क्या जा रहे हो। इसमें शक नहीं कि विपक्ष के तमाम नेताओं ने लालू की बातों में आनंदानुभूति प्राप्त की थी। भगवान केदारनाथ की गुफा में जब इस देश ने फकीर स्वरूप नरेंद्र मोदी को रात भर साधना करते देखा तो लगा कि नहीं, वाकई कोई फकीर ही इस देश को आगे ले जा सकता है।

उत्तर प्रदेश में यही हालत कमोबेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की है। मुख्यमंत्री निवास में बिना किसी एसी-कूलर के एक सामान्य से तखत पर शयन करने और उत्तर प्रदेश को तरक्की के शिखर पर ले जाने वाले योगी आदित्यनाथ को बाबा मुख्यमंत्री और चिलमजीवी कहने वाले नेताओं का क्या कहा जाए? जिनकी आंखें इतना भी नहीं देख पा रहीं, वे प्रदेश का विकास करेंगी भी तो किस तरह। फकीर तो राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह को भी कहा गया लेकिन उनकी लगाई आरक्षण की आग देश को कितनी भारी पड़ी? यह भी किसी से छिपा नहीं है।

कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी राहुल गांधी, मणि शंकर अय्यर और शशि थरूर ने विगत 5-7 सात सालों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए क्या कुछ नहीं कहा लेकिन मानना पड़ेगा मोदी को, उन्होंने इन नेताओं के आरोपों के कचरे से भी अपने लिए राजनीतिक संभावनाएं तलाश लीं और देश को प्रकारांतर से एक संदेश दिया कि बेकार कुछ भी नहीं होता। जरूरत इस बात की है कि आप उसका इस्तेमाल कैसे करते हैं? डुमरियागंज की एक सभा में उन्होंने कहा था कि यह सही है कि मैं नीच जाति में पैदा हुआ हूं, पर मेरा सपना है एक भारत, श्रेष्ठ भारत।‘ हो सकता है कुछ लोगों को यह नज़र नहीं आता हो पर निचली जातियों के त्याग, बलिदान और पुरुषार्थ की देश को इस ऊंचाई पर पहुंचाने में अहम भूमिका है। आजकल हर विपक्षी दल यहां तक कि कांग्रेस भी जातिगत गणना की मांग रही है। यह सच है कि देश में मंडल कमीशन के बाद पिछड़ा वर्ग की गणना ही नहीं हुई है। तत्कालीन आंकड़ों की मानें तो पिछड़ा वर्ग की आबादी देश में 52 प्रतिशत है। 2011 से 2016 के बीच हुई सामाजिक आर्थिक और जाति जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग को संवैधानिक दर्जा देने का काम किया है।

123वां संविधान संशोधन करके संविधान में एक नया अनुच्छेद 338बी जोड़ा गया।आयोग को अब सिविल कोर्ट की तरह अधिकार दिए गए । अब वह देश भर से किसी भी व्यक्ति को सम्मन कर सकता है और उसे शपथ के तहत बयान देने को कह सकता है। उसे अब पिछड़ी जातियों की स्थिति का अध्ययन करने और उनकी स्थिति सुधारने के बारे में सुझाव देने तथा उनके अधिकारों के उल्लंघन के मामलों की सुनवाई करने का भी अधिकार होगा। अब इस आयोग को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग या राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के बराबर का दर्जा मिल गया है। इसके बाद भी अगर सरकार पर पिछड़ों और दलितों की उपेक्षा के आरोप लग रहे हैं तो इसे दल छोड़ने वाले नेताओं की बुद्धि की बलिहारी नहीं तो और क्या कहा जाएगा?

बीजेपी का ओबीसी आबादी के लिए दूसरा बड़ा कदम है ओबीसी जातियों के बंटवारे के लिए आयोग का गठन। 2 अक्टूबर, 2017 को केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत एक आयोग के गठन की अधिसूचना जारी की। इस आयोग को ओबीसी के अंदर विभिन्न जातियों और समुदायों को आरक्षण का लाभ कितने असमान तरीके से मिले, इसकी जांच करने और ओबीसी के बंटवारे के लिए तरीका, आधार और मानदंड तय करने तथा ओबीसी को उपवर्गों में रखने जैसे काम सौंपे गए हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मानना है कि इस आयोग के बनने से अति पिछड़ी जातियों को न्याय मिल पाएगा। इस आयोग के गठन के पीछे तर्क यह है कि ओबीसी में शामिल पिछड़ी जातियों में पिछड़ापन समान नहीं है इसलिए ये जातियां आरक्षण का लाभ समान रूप से नहीं उठा पातीं। देश के सात राज्यों में पिछड़ी जातियों में पहले से ही बंटवारा है।

नरेंद मोदी तो प्रधानमंत्री बनने के दिन से ही अति दलितों और अति पिछड़ों के विकास का काम कर रहे हैं। ऐसे में भाजपा पर इन जातियों की उपेक्षा का आरोप किसी भी लिहाज से गले नहीं उतरता। सिख समाज के लिए उन्होंने हाल ही में घोषणा की है कि गुरु गोविंद सिंह के वीर पुत्रों की शहादत की याद में अब सरकार हर साल 26 दिसंबर को वीर बाल दिवस मनाएगी। प्रधानमंत्री तो देश में कई हुए। लेकिन सिखों के बारे में, उनके धार्मिक और पारंपरिक मूल्यों को बढ़ाने का काम केवल नरेंद्र मोदी ने किया। इसी तरह नेताजी सुभाषचंद्र बोस के सम्मान में हर साल 23 जनवरी से गणतंत्र दिवस समारोह शुरू करने का उनका निर्णय भी बेहद सराहनीय है। कुछ लोग इसे पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा में हो रहे विधानसभा चुनावों से जोड़कर भी इसे देख सकते हैं। देखना भी चाहिए लेकिन इस संदेशों में सबको साथ लेकर, उनका विश्वास हासिल कर सबका विकास करने की अभिलाषा तो दिखती ही है। इस इच्छाशक्ति के धनी देश में और कितने नेता हैं। आलोचना करना और बात है।

सियाराम पांडेय ‘शांत’