नर्सिंग डे: समाज के लिए नर्सों के योगदान को नमन

कोरोना काल में दुनिया भर में लाखों लोगों की मौत हुई लेकिन करोड़ों लोगों के प्राण बचाने में भी सफलता मिली। इसका श्रेय जाता है नर्सिंग कर्मियों को, जो स्वयं के संक्रमित होने के खतरे के बावजूद अपनी जान की परवाह किए बिना ज्यादा से ज्यादा लोगों की जान बचाने में जुटे रहे। 12 मई को मनाए जा रहे अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस पर नर्सों के इसी योगदान को नमन करना जरूरी है। यह दिवस दया और सेवा की प्रतिमूर्ति फ्लोरेंस नाइटिंगेल की स्मृति में मनाया जाता है, जिन्हें ‘आधुनिक नर्सिंग की जन्मदाता’ माना जाता है।

‘लेडी विद द लैंप’ (दीपक वाली महिला) के नाम से विख्यात नाइटिंगेल का जन्म 12 मई 1820 को इटली के फ्लोरेंस शहर में हुआ था। भारत सरकार ने वर्ष 1973 में नर्सों के अनुकरणीय कार्यों को सम्मानित करने के लिए उन्हीं के नाम से ‘फ्लोरेंस नाइटिंगेल पुरस्कार’ की स्थापना की, जो नर्स दिवस के अवसर पर प्रदान किए जाते हैं। फ्लोरेंस कहती थी कि रोगी का बुद्धिमान और मानवीय प्रबंधन ही संक्रमण के खिलाफ सबसे अच्छा बचाव है।

फ्लोरेंस नाइटिंगेल का जन्म इटली में रह रहे एक समृद्ध और उच्चवर्गीय ब्रिटिश परिवार में हुआ था लेकिन वह इंग्लैंड में पली-बढ़ी। वह बेहद खूबसूरत, पढ़ी-लिखी और समझदार युवती थी। उन्होंने अंग्रेजी, इटेलियन, लैटिन, जर्मनी, फ्रैंच, इतिहास और दर्शन शास्त्र सीखा तथा अपनी बहन और माता-पिता के साथ कई देशों की यात्रा की। 16 वर्ष की आयु में ही उन्हें अहसास हो गया कि उनका जन्म सेवा कार्यों के लिए ही हुआ है।

1837 में नाइटिंगेल परिवार अपनी बेटियों को यूरोप के सफर पर ले गया, जो उस समय बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के लिए जरूरी माना जाता था। उसी सफर के दौरान फ्लोरेंस ने माता-पिता से कहा था कि ईश्वर ने उसे मानवता की सेवा का आदेश दिया है लेकिन यह नहीं बताया कि सेवा किस तरह से करनी है। यह सुनकर माता-पिता बेहद परेशान हो गए थे। फ्लोरेंस ने माता-पिता को बताया कि वह एक ऐसी नर्स बनना चाहती है, जो अपने मरीजों की अच्छी तरह सेवा और देखभाल कर सके। इस पर माता-पिता बेहद नाराज हुए थे क्योंकि विक्टोरिया काल में ब्रिटेन में अमीर घरानों की महिलाएं कोई काम नहीं करती थी। उस दौर में नर्सिंग को एक सम्मानित व्यवसाय भी नहीं माना जाता था, इसलिए भी माता-पिता का मानना था कि धनी परिवार की लड़की के लिए वह पेशा बिल्कुल सही नहीं है।

वह ऐसा समय था, जब अस्पताल बेहद गंदी जगह पर होते थे और वहां बीमार लोगों की मौत के बाद काफी भयावह माहौल हो जाता था। परिवार के पुरजोर विरोध और गुस्से के बाद भी फ्लोरेंस अपनी जिद पर अड़ गई और वर्ष 1845 में अभावग्रस्त लोगों की सेवा का प्रण लिया। वर्ष 1849 में उन्होंने शादी करने का प्रस्ताव भी ठुकरा दिया और परिजनों से दृढ़तापूर्वक कहा कि वह ईश्वर के आदेश का पालन करेगी तथा एक नर्स ही बनेगी। वर्ष 1850 में उन्होंने जर्मनी में प्रोटेस्टेंट डेकोनेसिस संस्थान में दो सप्ताह की अवधि में एक नर्स के रूप में अपना प्रारंभिक प्रशिक्षण पूरा किया। मरीजों, गरीबों और पीडि़तों के प्रति उनके सेवाभाव को देखते हुए आखिरकार उनके माता-पिता द्वारा वर्ष 1851 में उन्हें नर्सिंग की आगे की पढ़ाई के लिए अनुमति दे दी गई, जिसके बाद उन्होंने जर्मनी में महिलाओं के लिए एक क्रिश्चियन स्कूल में नर्सिंग की पढ़ाई शुरू की, जहां उन्होंने मरीजों की देखभाल के तरीकों और अस्पतालों को साफ रखने के महत्व के बारे में जाना। वर्ष 1853 में उन्होंने लंदन में महिलाओं के लिए एक अस्पताल ‘इंस्टीच्यूट फॉर द केयर ऑफ सिंक जेंटलवुमेन’ खोला, जहां उन्होंने मरीजों की देखभाल के लिए बहुत सारी बेहतरीन सुविधाएं उपलब्ध कराई और नर्सों के लिए कार्य करने की स्थिति में भी सुधार किया।

नर्सिंग के क्षेत्र में पहली बार उनका अहम योगदान वर्ष 1854 में क्रीमिया युद्ध के दौरान देखा गया। युद्ध के दौरान सैनिकों के जख्मी होने, ठंड, भूख तथा बीमारी से मरने की खबरें आई। युद्ध के समय वहां उनकी देखभाल के लिए कोई उपलब्ध नहीं था। ऐसे में ब्रिटिश सरकार द्वारा फ्लोरेंस के नेतृत्व में अक्तूबर 1854 में 38 नर्सों का एक दल घायल सैनिकों की सेवा के लिए तुर्की भेजा गया। फ्लोरेंस ने वहां पहुंचकर देखा कि किस प्रकार वहां अस्पताल घायल सैनिकों से खचाखच भरे हुए थे, जहां गंदगी, दुर्गंध, दवाओं तथा उपकरणों की कमी, दूषित पेयजल इत्यादि के कारण असुविधाओं के बीच संक्रमण से सैनिकों की बड़ी संख्या में मौतें हो रही थी।

फ्लोरेंस ने अस्पताल की हालत सुधारने के अलावा घायल और बीमार सैनिकों की देखभाल में दिन-रात एक कर दिया, जिससे सैनिकों की स्थिति में काफी सुधार हुआ। उनकी अथक मेहनत के परिणामस्वरूप ही अस्पताल में सैनिकों की मृत्यु दर में बहुत ज्यादा कमी आई। उस समय किए गए उनके सेवा कार्यों के लिए ही सभी सैनिक उन्हें आदर और प्यार से ‘लेडी विद द लैंप’ कहने लगे थे। दरअसल जब चिकित्सक अपनी ड्यूटी पूरी करके चले जाते, तब भी वह रात के गहन अंधेरे में हाथ में लालटेन लेकर घायलों की सेवा के लिए उपस्थित रहती थी। रात में अस्पताल में जब घायल सैनिक सो रहे होते, तब वह स्वयं उनके पास जाकर देखती कि किसी को कोई तकलीफ तो नहीं है।

वर्ष 1856 में युद्ध की समाप्ति के बाद जब वह वापस लौटी, तब नायिका के तौर पर उभरी फ्लोरेंस के बारे में अखबारों में बहुत कुछ छपा और उसके बाद उनका नाम ‘लेडी विद द लैंप’ काफी प्रसिद्ध हो गया। स्वयं महारानी विक्टोरिया ने पत्र लिखकर उनका धन्यवाद किया था। सितम्बर 1856 में रानी विक्टोरिया से उनकी मुलाकात हुई, जिसके बाद उनके सुझावों के आधार पर ही वहां सैन्य चिकित्सा प्रणाली में बड़े पैमाने पर सुधार संभव हुआ और वर्ष 1858 में रॉयल कमीशन की स्थापना हुई। उसके बाद ही अस्पतालों की सफाई व्यवस्था पर ध्यान देना, सैनिकों को बेहतर खाना, कपड़े और देखभाल की सुविधा मुहैया कराना तथा सेना द्वारा डॉक्टरों को प्रशिक्षण देने जैसे कार्यों की शुरूआत हुई। फ्लोरेंस के प्रयासों से वर्ष 1860 में लंदन के सेंट थॉमस हॉस्पिटल में ‘नाइटिंगेल ट्रेनिंग स्कूल फॉर नर्सेज’ खोला गया, जहां नर्सों को बेहतर प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था। सेवाभाव से किए गए फ्लोरेंस के कार्यों ने नर्सिंग व्यवसाय का चेहरा ही बदल दिया, जिसके लिए उन्हें रेडक्रॉस की अंतरराष्ट्रीय समिति द्वारा सम्मानित किया गया। यही समिति फ्लोरेंस नाइटिंगेल के नाम से नर्सिंग में उत्कृष्ट सेवाओं के लिए पुरस्कार देती है।

वर्ष 1869 में उन्हें महारानी विक्टोरिया ने ‘रॉयल रेड क्रॉस’ से सम्मानित किया था। मरीजों, गरीबों और पीडि़तों के प्रति फ्लोरेंस की सेवा भावना को देखते हुए ही नर्सिंग को उसके बाद महिलाओं के लिए सम्मानजनक पेशा माना जाने लगा और उनकी प्रेरणा से ही नर्सिंग क्षेत्र में महिलाओं को आने की प्रेरणा मिली। फ्लोरेंस के अथक प्रयासों के कारण रोगियों की देखभाल तथा अस्पताल में स्वच्छता के मानकों में अपेक्षित सुधार हुए। 90 वर्ष की आयु में 13 अगस्त 1910 को फ्लोरेंस नाइटिंगेल का निधन हो गया। स्वच्छता तथा स्वास्थ्य सेवा को लेकर फ्लोरेंस के विचार सही मायनों में आधुनिक चिकित्सा जगत में भी 19वीं सदी जितने ही प्रासंगिक हैं।

योगेश कुमार गोयल