न मास्क-न दो गज की दूरी, होलिका की अग्नि से मांगा कोरोना का खात्मा

नई दिल्लीः वैश्विक महामारी कोरोना के संक्रमण के बीच होली के त्योहार का उल्लास घरों के आंगन से सड़कों तक बिखर गया है। सरकारी बंदिशों के बावजूद राजधानी जयपुर समेत प्रदेश भर में होली का त्योहार रविवार को पारम्परिक अंदाज में उल्लास के साथ मनाया गया। शहरों समेत ग्रामीण क्षेत्रों में होलिका दहन कर दूल्हे की तरह सजे नौनिहालों को परिजनों ने होलिका के फेरे लगवाकर ढूंढ की रस्म अदा करवाई। चिंतनीय यह रहा कि फेस मास्क और दो गज की दूरी का पालन किए बगैर लोगों ने रविवार को होलिका की अग्नि से कोरोना के खात्मे की मन्नतें मांगी। होलिका दहन के लिए जुटे लोगों ने होलिका की अग्नि के समक्ष कोरोना के खात्मे की दूरी की मन्नत तो मांगी, लेकिन कोरोना गाइडलाइन की पालना भूल गए।

प्रदेश के शहरों, गांवों व कस्बों में रविवार की शाम लोग ढोल की थाप और थाली की झनकार के बीच होली दहन स्थल पर पहुंचे। जहां लोगों ने रंगोली सजाकर चुनरी उड़ाते हुए होलिका का पूजन किया। इसके बाद होलिका दहन करने के लिए होली मंगलीजे है… के उद्घोष के साथ विधिवत पूजा-अर्चना कर होलिका को अग्नि के हवाले किया। इस दौरान उत्साही युवाओं ने सांकेतिक तौर पर होलिका की गोद में बैठे प्रहलाद को अग्नि के बीच सकुशल बाहर निकाल लिया। होली की झाल (आग) में गेहूं की बालियां सेकी गई।

अदा की ढूंढ की रस्म

जिन घरों में पिछले एक साल में नौनिहालों का जन्म हुआ, उनके परिजन नौनिहालों को दूल्हा बनाकर नाचते-गाते लेकर होलिका दहन स्थल पर लेकर पहुंचे। यहां होलिका दहन के बाद परिजनों ने बच्चों को गोद में लेकर बच्चों की सुख-समृद्धि की कामना करते हुए होलिका के फेरे लगवाए। ग्रामीण क्षेत्रों में तो पूरे गांव की एक ही होली पर बड़ी संख्या में ढूंढ की रस्म अदा करने पहुंचे लोगों के कारण मेले जैसा माहौल रहा।

आस्था के आगे नतमस्तक हुई सरकारी बंदिशें

राज्य सरकार की ओर से जारी की गई गाइडलाइन के अनुरूप होलिका दहन के लिए शाम 4 से रात्रि 10 बजे तक सार्वजनिक कार्यक्रमों की अनुमति दी गई थी। ऐसे कार्यक्रमों में 50 से ज्यादा लोगों को एकत्र होने की अनुमति नहीं दी गई थी, बावजूद इसके आस्था व श्रद्धा के आगे सरकारी बंदिशे नतमस्तक हो गई। होलिका दहन के सार्वजनिक कार्यक्रमों में परंपरा का निर्वहन करने के लिए ज्यादा भीड़ भी जुटी। शाम के समय प्रदोष काल में होलिका दहन हुआ। ज्योतिषियों के अनुसार होलिका दहन का शुभ मुहूर्त रविवार को प्रदोष काल में शाम 6 बजकर 37 मिनट से 8 बजकर 56 मिनट के बीच रहा। छोटी होली की पूजा करने के लिए विभिन्न स्थानों पर होलिका दहन वाली जगह को गाय के गोबर से लीपकर साफ-सुथरा किया गया। इसके बाद गंगाजल से उस जगह को पवित्र कर सूखे उपले, सूखी लकड़ी, सूखी घास आदि रखी गई। एक लोटे में जल, गाय के गोबर से बने उपले, चावल, रोली, गंध के साथ नई फसलें चने या गेहूं की बालियां लेकर होलिका के चारों ओर तीन या सात बार परिक्रमा करते हुए सारी चीजों को होलिका दहन की अग्नि में समर्पित किया गया। मान्यता है कि ऐसा करने से आरोग्यता में वृद्धि होती है।