पर्यटकों के बोझ तले दबते पहाड़

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वर्तमान में भारत के कई हिस्सों में पारा 45 डिग्री के पार पहुंचने से राहत की तलाश में लाखों लोग मशहूर पर्वतीय ठिकानों का रुख कर रहे हैं। पर्यटकों और उनके वाहनों के बढ़ते बोझ से पहाड़ियों (mountains) पर बोझ काफी बढ़ रहा है। भारी तादाद में पर्यटकों और उनके वाहनों का बोझ बढ़ने से पहाड़ियां कराह रही हैं और पर्यावरण संतुलन गड़बड़ाने लगा है। इलाके में मीलों लंबा ट्रैफिक जाम लग रहा है और वाहनों को पार्क करने की जगह नहीं होने की वजह से कई किलोमीटर पहले ही उनको खड़ा करना पड़ रहा है। लगातार बढ़ती भीड़ इसके चलते पानी का संकट भी गंभीर हो हो रहा है। होटलों में जगह नहीं होने की वजह से सैकड़ों लोग कारों में और खुली जगहों पर सोने को मजबूर हैं।

पूर्वी भारत के सिक्किम और दार्जिलिंग जैसे पर्वतीय केंद्र हों या फिर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के, हर जगह एक जैसा नजारा है। इन पर्वतीय शहरों तक पहुंचने के लिए पहले तो घंटों ट्रैफिक जाम में खड़ा रहना पड़ता है और फिर उसके बाद किसी तरह पहुंचे भी तो न होटलों में जगह और न ही रेस्तरां में जगह मिल पाती है। पारा चढ़ने के साथ भारी गर्मी से निजात पाने के लिए कई लोग पहले से बुक किए बिना ही पहाड़ों पर पहुंच रहे हैं, लेकिन उनको यहां गर्मी से राहत भले मिल जाती हो, होटल या पार्किंग की जगह नहीं मिलती। नतीजतन सैकड़ों लोग अपनी कारों में या खुले में रात गुजार रहे हैं या फिर अपनी किस्मत को कोसते हुए वापस जा रहे हैं। मनाली-शिमला और उत्तराखंड के नैनीताल-भीमताल और चमोली में पहुंचने के लिए वाहनों की कतार लगी है।

घंटों लोग जाम में फंस रहे हैं। शायद इन पर्यटकों को इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं कि जो मजा लेने के लिए वे पहाड़ों पर जा रहे हैं, वह उनके लिए सजा भी बन सकता है। पहले से ही बोझ झेल रहे पहाड़ों पर भीड़ तबाही भी ला सकती है। पर्यावरणविदों ने मौजूदा स्थिति पर गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि पर्यटकों की तादाद तेजी से बढ़ने की वजह से इलाके की आधारभूत व्यवस्था के साथ पर्वारण संतुलन भी गड़बड़ा रहा है। हजारों की तादाद में पहुंचने वाले वाहन इलाके में प्रदूषण बढ़ा रहे हैं। लगातार बढ़ती भीड़ किसी भी समय हादसों की वजह बन सकती है। इसके अलावा पर्यावरण को तो नुकसान हो ही रहा है। संबंधित सरकारी एजंसियों को इस पर ध्यान देना चाहिए।

कभी भी पहाड़ों पर आ सकती है आपदा

पहाड़ों पर आपदा आ रही है, इससे न तो हिमाचल प्रदेश अछूता है और न ही उत्तराखंड। चाहे चमोली हो, शिमला हो, जोशीमठ हो या फिर मनाली, हर जगह खतरा है। उत्तराखंड और हिमाचल के टूरिस्ट स्पॉट डेंजर जोन में हैं। खास तौर से मनाली, शिमला और नैनीताल ऐसे इलाके हैं, जहां पहले से क्षमता से अधिक बोझ है। इसी साल की शुरुआत में जब जोशीमठ को धंसने की वजह से खाली कराया जा रहा था, तब इस बावत कई चेतावनियां जारी भी की गईं थी।

इनमें बताया गया था कि कैसे पहाड़ों पर लगातार बढ़ रहा बोझ खतरा बन सकता है। समय-समय पर पहाड़ों में आने वाली आपदा इन्हीं खतरों का संकेत मानी जा रही है। सबसे खास बात ये है कि हिमाचल के सबसे बड़े टूरिस्ट स्पॉट शिमला और मनाली सबसे ज्यादा खतरे में हैं। पहाड़ काट कर हो रहे निर्माण और पनबिजली संयंत्र लगाने के धमाकों से पहाड़ का सीना फट रहा है। तलहटी के हरिद्वार, देहरादून सरीखे शहर बजबजाते स्लम बन चुके हैं। गोमुख से हरिद्वार तक सभ्यता का ज़हरीला कचरा फैल गया है। देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड की भूमि धार्मिक पर्यटन के बोझ तले खंड-खंड हो रही है, पर यह बात सच है।

पिछले साल जुलाई माह में भारी भूस्खलन की चपेट ने लगभग चालीस जानें ले ली थीं। इस बार मई माह में बद्रीनाथ और केदारनाथ के मंदिरों के पट खुलते ही चार धाम यात्रा को देश भर से यात्रियों का भारी जत्था फिर निकल पड़ा। अब खबर मिली है कि उसके हज़ारों सदस्य नंदप्रयाग चमोली इलाके में राजमार्ग पर हुए भारी भूस्खलन के कारण एक बार फिर खतरनाक इलाके में अटक गये हैं, जबकि अभी तो मानसून की भारी बारिश भी शुरू नहीं हुई है। इसी यात्रा के दौरान जून 2013 में केदारनाथ क्षेत्र में विकट बाढ़ से जो भीषण तबाही मची, जितनी जानें गईं और ताश के पत्तों की तरह मकानात गिरे, उसकी छवियां सबके मन से मिटी नहीं। फिर भी न जाने क्यों तीर्थयात्रियों ही नहीं, राज्य की नई भाजपा सरकार ने भी पुरानी सरकार की गलतियों से सबक नहीं लिया।

धार्मिक पर्यटन से भरपूर कमाई करने का मोह त्यागने तथा इलाके के नाज़ुक पर्यावरण की चिंता करने की बजाय गर्मी से पहले ही निजी एजेंटों ने तीर्थयात्रा के लिये तमाम तरह के आकर्षक टूर पैकेज और सरकार ने देव भूमि के दर्शन के लिये नए मुख्यमंत्री की छवि समेत श्रद्धालुओं का स्वागत करते हुए अनेक विज्ञापन अखबारों, टी वी पर जारी कर दिये। मीडिया में यह देख कर कि किस तरह मंदिरों के पट खुलते ही पहले ही दिन देश के लोकप्रिय-धर्मपरायण प्रधानमंत्री दर्शनार्थ केदारनाथ मंदिर चले आये, सामान्य पर्यटकों श्रद्धालुओं का भी चार धाम यात्रा को ले कर आकर्षित और आश्वस्त होना स्वाभाविक था। हिमालय का यह इलाका जिसमें उत्तर भारत के सबसे विख्यात धर्मस्थल और उसकी सबसे बड़ी नदियों के उद्गम स्थित हैं, लंबे समय से (पर्यावरण और भूकंप की दृष्टि से) देश-विदेश के वैज्ञानिकों द्वारा लगातार बेहद नाज़ुक बताया जाता रहा है। ग्लोबल गर्मी बढ़ने से ॠतुचक्र में भारी असामान्यता भी आई है, जिससे इलाके में अकारण बादल फटने और बेमौसम ओले बरसने का नया क्रम कुछ सालों से देखने में आ रहा है, जिससे जान माल की भारी क्षति हुई है।

एक अंग्रेजी अखबार में प्रकाशित आंकड़े के अनुसार साल 2022 में पांच करोड़ पर्यटक उत्तराखंड पहुंचे थे। जोशीमठ की बात करें तो 2019 में 4.9 लाख पर्यटक यहां पहुंचे थे। वहीं 2018 में जोशीमठ में 2.4 लाख पर्यटक पहुंचे। मसूरी में 2017 में पहुंचे पर्यटकों की संख्या 27 लाख थी। 2018-19 में यहां 18 लाख पर्यटक घूमने पहुंचे थे। 2020 में पर्यटकों की संख्या 10 लाख थी। 2021 में 12 लाख पर्यटक यहां पहुंचे थे। इसी तरह नैनीताल में 2017 में 9.1 लाख, 2018 और 2019 में 9.3, 2020 में 2.1 और 2021 में यहां 3.3 लाख पर्यटक पहुंचे थे। शिमला, मनाली और लद्दाख समेत तमाम पर्यटक स्थलों पर भारी भीड़ जुट रही है। पहाड़ों पर कई किलोमीटर लंबा जाम लग रहा है। जाम में बच्चे, बूढ़े, महिला सब फंसे हैं। बसों में बच्चे रो रहे हैं। घंटों जाम की वजह से लोग भूख-प्यास से परेशान हैं। सोचिए अगर ऐसे में कोई मेडिकल इमरजेंसी हो जाए तो क्या होगा? कैसे एंबुलेंस पहुंचेगी, कैसे कोई मरीज अस्पताल पहुंच पाएगा।

ट्रेनें और बसें पहले से ही फुल हैं। ऐसे में लोग अपनी पर्सनल कार या टैक्सी से हिमाचल की ओर कूच कर रहे हैं। लाहौल-स्पीति पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार पिछले 24 घंटों में अटल टनल पर रेकॉर्ड ट्रैफिक मूवमेंट देखा गया है। अटल टनल से 28 हजार 210 वाहन गुजरे, जो इसके उद्घाटन के बाद से सबसे अधिक है। यही हाल शिमला का भी है। सोलन से एनएच-5 होते हुए दो दिन में 21 हजार से ज्यादा वाहन शिमला की ओर रवाना हुए। शिमला के सर्कुलर रोड पर भी वाहन रेंगते नजर आए। स्थानीय लोग बता रहे हैं कि शिमला और मनाली में पार्किंग फुल हैं, लोग सड़कों के किनारे वाहन खड़े कर रहे हैं। पुलिस ने पूरे इलाके में ट्रैफिक अलर्ट जारी किया है।

प्राकृतिक संतुलन के साथ खिलवाड़

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पहाड़ों पर लोग न सिर्फ भीड़ बढ़ाकर प्रकृति के संतुलन के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, बल्कि कानूनों को तोड़ने से भी बाज नहीं आ रहे हैं। सोशल मीडिया पर लाहौल और स्पीति से एक वीडियो सामने आया है। इस वीडियो में कुछ लोग चंद्रा नदी में अपनी थार कार को दौड़ा रहे हैं। वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने इस कार का चालान कर दिया। क्या हम वाकई अपनी मस्ती में इतने चूर हो गए हैं कि न प्रकृति की चिंता है न कानून का डर? बचपन में हमने सुना था कि हमें आजादी है, हम सड़क पर अपनी लाठी चला सकते हैं, लेकिन तब तक जब तक ये किसी की नाक में न लगे, यानी हम आजादी और मौज-मस्ती के नाम पर दूसरों को नुकसान नहीं पहुंचा सकते, लेकिन ये बात समझने में इतनी मुश्किल क्यों आ रही है? हरदिन जश्न मनाइए, खूब एन्जॉय करिए, बढ़िया खाना-पीना करिए, दोस्तों से मिलिए, आपको कौन रोक रहा है, लेकिन नहीं है,जश्न पहाड़ों का भी है। वहां रहने वाले स्थानीय लोगों का भी है।

पहले से फुल चार्ज मोबाइल को जबरदस्ती बिजली से जोड़ा जाएगा तो ब्लास्ट होना तय है। पहाड़ों पर बोझ मत बनिए। उसे भी आजाद रहने का हक है। हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते पर्यटन के चलते हिल स्टेशनों पर दबाव बढ़ रहा है। इसके साथ ही पर्यटन के लिए जिस तरह से इस क्षेत्र में भूमि उपयोग में बदलाव आ रहा है, वो अपने आप में एक बड़ी समस्या है। जंगलों का बढ़ता विनाश भी इस क्षेत्र के इकोसिस्टम पर व्यापक असर डाल रहा है। एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई है, जिसमें कहा गया था कि पर्यटन ने हिमालय क्षेत्र में आर्थिक समृद्धि तो लाइ है, लेकिन इसका खामियाजा पर्यावरण को भुगतना पड़ रहा है। देखा जाए तो इस क्षेत्र में जो नागरिक सुविधाएं उपलब्ध हैं, उनके भीतर पर्यटन का प्रबंधन अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। इसके साथ ही बुनियादी सुविधाओं की कमी भी एक समस्या है। उदाहरण के लिए लद्दाख को ही देख लीजिए, जो पहले ही जल संकट की समस्या से ग्रस्त क्षेत्र है। वहां पर्यटन ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है। गौरतलब है कि यह क्षेत्र अपनी पानी की मांग के लिए ज्यादातर बर्फ या हिमनदों के पिघलने और सिंधु नदी के प्रवाह पर निर्भर है।

इस क्षेत्र में जहां एक स्थानीय निवासी प्रति दिन 75 लीटर पानी का उपयोग करता है, वहीं एक पर्यटक के लिए हर रोज करीब 100 लीटर पानी की जरुरत है, ऐसे में यह बढ़ी हुई मांग वहां जल स्रोतों पर कहीं ज्यादा दबाव डाल रही है। क्षेत्र में स्थानीय लोगों के स्थाई रोजगार को ध्यान में रखना जरुरी है। वहीं साथ ही अनियमित पर्यटन के चलते इस क्षेत्र में पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र को होते नुकसान को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। एक रिपोर्ट के मुताबिक उन पर्यटक स्थलों से सबक सीखने की जरुरत है, जो पहले ही बढ़ते पर्यटकों का दबाव झेल रहे हैं। साथ ही रिपोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया है कि हिमालयी राज्यों को एक ऐसा तंत्र विकसित करने की जरुरत है, जिसमें पर्यटन के शाश्वत विकास के साथ-साथ इकोसिस्टम और जैवविविधता पर पड़ते प्रभाव को भी कम से कम किया जा सके।

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साल दर साल सैलानियों की आमद वर्ष 2016 में हिमाचल में देश और विदेश से 1.79 करोड़ सैलानी आए। 2017 में 1 करोड़ 96 लाख 9 सैलानी, वर्ष 2018 में 1 करोड़ 64 लाख 50 हजार, 2019 में में 1 करोड़ 72 लाख 12 हजार सैलानी आए। चूंकि मार्च 2020 में कोरोना के कारण लॉक डाउन लगता रहा लिहाजा दिसंबर 2020 तक हिमाचल में कुल 32 लाख 13 हजार सैलानी यहां सैर के लिए आए। वर्ष 2021 में यहां 56.37 लाख सैलानी आए, इनमें से 56.32 देशी और पांच हजार विदेशी सैलानी आए। वर्ष 2024 में हिमाचल आने वाले सैलानियों की संख्या फिर बढ़ी और ये डेढ़ करोड़ से अधिक हो गई।

ज्योतिप्रकाश खरे

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