2027 के लिए चुनौती बनेगा 2024 का जनादेश

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लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा शासित राज्यों में सबसे ज्यादा चर्चा उत्तर प्रदेश में आए चुनाव परिणामों को लेकर हो रही है क्योंकि उत्तर प्रदेश में 2014 के लोकसभा चुनाव से भाजपा के पक्ष में जो माहौल बना, वह 10 वर्ष में लगभग धड़ाम होता दिख रहा है। 2014 में 71 और 2019 में 62 सीट पाने वाली भाजपा इस बार 33 सीटों पर सिमट गई, जिसका सीधा असर यह हुआ कि केन्द्र में भाजपा की सीटें 240 पर टिक गई। यद्यपि राजग के सहयोगी दलों के सहयोग से सरकार तो बन गई है लेकिन अब प्रधानमंत्री को प्रत्येक कड़े निर्णय के लिए सहयोगियों का सहारा लेना अपरिहार्य होगा। इस चुनाव में भाजपा ने अपने लिए 370 और गठबंधन के लिए 400 पार का नारा दिया था, परन्तु गठबंधन भी 300 का आंकड़ा नही पार कर पाया। चुनाव के बाद मतगणना से पूर्व तक उत्तर प्रदेश में 65-70 सीटों का आंकलन किया जाता रहा है लेकिन परिणाम एकदम विपरीत आए तो हार के कारणों के साथ ही भविष्य की चुनौतियों को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद रामभक्तों के उत्साह को देख कर भाजपा सहित राजनीतिक समीक्षकों का आंकलन था कि भाजपा उत्तर प्रदेश सहित देश के अनेक राज्यों में इस बार क्लीन स्वीप करेगी।

देश के छः राज्यों, मध्य प्रदेश, दिल्ली, हिमांचल, उत्तराखंड, अरुणाचल और अंडमान निकोबार में भाजपा को शत-प्रतिशत सीटें मिली जबकि ओडिशा में 21 में 20 सीट, गुजरात में 26 में 25 सीट, छत्तीसगढ में 11 में 10 सीट, असम में 14 में 09 सीट और झारखंड में 14 में 08 सीट, सीटें मिली। दूसरी ओर अपने पक्ष में माहौल और जनादेश बताने वाली कांग्रेस का 12 राज्यों में खाता तक नही खुला। यह कोई छोटे राज्य नहीं है बल्कि इसमें वह राज्य भी शामिल हैं, जहां कांग्रेस सत्ता में है या फिर सत्ता में रह चुकी है। हिमाचल में कांग्रेस सत्ता में है, मध्य प्रदेश में वह पिछले साल सत्ता की दावेदार थी, दिल्ली में सत्तारुढ़ आम आदमी के साथ गठबंधन हैं।

आंध्र प्रदेश, उत्तराखंड, त्रिपुरा आदि राज्यों में कांग्रेस अपने प्रभाव का दावा करती रही है लेकिन यहां उसका परिणाम शून्य रहा है। इन आंकड़ों से इतर उत्तर प्रदेश की बात की जाए तो प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में 75 सीट पर भाजपा और 05 सीट पर सहयोगी दलों, आरएलडी 02, अपना दल 02 और सुभासपा 01 ने चुनाव लड़ा था लेकिन भाजपा 33, आरएलड़ी 02 और अपना दल को 01 सीट ही मिल सकी। प्रदेश में भाजपा के इतने खराब प्रदर्शन को लेकर पार्टी और राजनीतिक समीक्षक परेशान है क्योंकि चुनाव पूर्व आए सर्वेक्षणों में भी पार्टी के बहुत बेहतर प्रदर्शन का आंकड़ा प्रस्तुत किया गया था।

भाजपा को खटक रही अयोध्या की शिकस्त

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव को अभी मात्र दो वर्ष ही बीते हैं, लेकिन इन दो वर्षों में भाजपा का प्रदर्शन ही बहुत निराशाजनक हो गया। भाजपा के तमाम दिग्गज नेता, मंत्री, संगठन पदाधिकारी चुनाव हार गए। पश्चिमी उप्र की 29 सीटो में 14 पर भाजपा और 02 पर सहयोगी आरएलडी की विजय हुई जबकि 2019 में भाजपा को 21 सीटें मिली थीं। पूर्वांचल की बात की जाए तो वाराणसी, आजमगढ़ और मीरजापुर की 12 संसदीय सीटों में मात्र 02 पर भाजपा 01 पर सहयोगी अपना दल को सफलता मिली। धर्मनगरी प्रयागराज मंडल की 05 सीटों में भाजपा मात्र 01 सीट फूलपुर ही बचा पाई जबकि पिछली बार उसने सभी सीटों पर परचम फहराया था। अयोध्या मंडल की 05 सीटों पर भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा जबकि 2019 में उसके पास 04 सीटें थी लेकिन देश और विदेश में जिस सीट पर भाजपा के हार की चर्चा हो रही है, वह सीट है ’’अयोध्या’’ जो अभी फैजाबाद के नाम से ही अभिलेखों में अंकित है।

500 वर्षों के संघर्ष के बाद जनवरी 2024 में राम मन्दिर की स्थापना से अयोध्या में जो राम लहर उठी “जो राम को लाए हैं हम उनको लाएंगे’’ वह फैजाबाद लोकसभा सीट पर भी भाजपा के पक्ष में मतों के रुप में परिवर्तित नहीं हो पाई। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इस लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाले 05 विधानसभा क्षेत्रों में से 04 अयोध्या, रुदौली, बीकापुर और दरियाबाद पर विजय पताका फहराई थी जबकि मिल्कीपुर (सुरक्षित) सीट पर सपा के अवधेश प्रसाद विजयी हुए थे, जो अब सांसद चुने गए हैं। लोकसभा चुनाव में मात्र अयोध्या विधानसभा क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी को 4,600 मतों की बढ़त मिली, जबकि पूर्व के चुनाव में यह 50 हजार से ज्यादा की हुआ करती थी। विधानसभा चुनाव में जीत का अंतर लगभग 20 हजार का था।

भाजपा प्रत्याशी लल्लू सिंह चौहान की हार के अनेक कारण गिनाए जा रहे हैं, जिसमें अयोध्या में हो रहे विकास के कारण तमाम लोगों का विस्थापन और उचित मुआवजा न मिलना, संविधान बदलने के लिए दो तिहाई से अधिक सीटों पर भाजपा को जिताने का वायरल संदेश, स्थानीय स्तर पर सस्ते दामों पर जमीन खरीद कर महंगे दामों पर बेचना, सरकार से आम लोगों की नाराजगी के साथ सपा-कांग्रेस का पीडीए समीकरण मुख्य कारण बना। भाजपा प्रत्याशी लल्लू सिंह चौहान यह सोच कर चुनाव लड़ रहे थे कि वोट तो राम के साथ-साथ मोदी और योगी के नाम पर मिलेगा ही। वह सत्ता में रहते हुए भी जनता की तमाम समस्याओं की उपेक्षा करते रहे।

मन्दिर के आस-पास विस्थापित हुए अधिकांश लोगों को वास्तविक मुआवजा नहीं मिल पाया क्योंकि जमीन का मालिकाना हक उनके पास नहीं था लेकिन यह भी सच है कि उस जमीन पर वह 50 साल, 70 साल से काबिज थे। उनके संविधान बदलने के लिए 400 सीटों वाले बयान को सपा प्रत्याशी ने आरक्षण से जोड़ कर अपने दलित समाज को यह समझाने का सफल प्रयास किया कि भाजपा आरक्षण समाप्त करना चाहती हैं। सबसे उल्लेखनीय तो यह है कि रुदौली में राम चन्द्र यादव भाजपा के विधायक हैं और उन्होंने 40 हजार मतों से चुनाव जीता था लेकिन लोकसभा में भाजपा यहां 12 हजार मतों से पिछड़ गई।

लोकसभा चुनाव में दरियाबाद और अयोध्या विधानसभा की बड़ी भूमिका रहती थी लेकिन इस बार दरियाबाद से भाजपा प्रत्याशी 10 हजार वोटों से पिछड़ गए। इस हार को लेकर अयोध्यावासियों पर तरह-तरह के आक्षेप, आरोप और दुत्कार लगाई जा रही है। अयोध्या में रह रहे श्याम जी चौबे इस हार से दुखी तो हैं लेकिन उससे ज्यादा दुखी इस हार को राम मन्दिर के निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा से जोड़े जाने पर हैं। उनका कहना है कि चुनाव भगवान श्रीराम के मन्दिर निर्माण के मुद्दे पर नहीं बल्कि स्थानीय मुद्दौं और पार्टियों के राजनीतिक समीकरण पर हुआ है। तमाम विरोधों के बाद भी अयोध्या में भाजपा प्रत्याशी ने बढ़त बनाई है।

2024 का जनादेश

2024 के जनादेश अथवा अखिलेश यादव के प्रदर्शन की बात करें तो सपा और कांग्रेस का गठबंधन और उनका पीडीए फॉर्मूला सफल बताया जा रहा है क्योंकि 2014 और 2019 के चुनाव में सपा किसी प्रकार अपना अस्तित्व बचा पाई थी और कांग्रेस तो प्रदेश में वेंटिलेटर पर चल रही थी। जिस पीडीए फॉर्मूले की बार-बार चर्चा हो रही है उसका छद्म रुप आम चुनाव से पूर्व हुए राज्यसभा के चुनाव में साफ दिखाई पड़ा था। पार्टी के तमाम विधायकों ने बगावत कर दी। पल्लवी पटेल ने ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के साथ मिल कर अपने अलग प्रत्याशी उतारे, मौर्या समाज के कद्दावर नेता स्वामी प्रसाद मौर्या भी चुनाव से पहले साथ छोड़ गए।

पाल समाज में लोक प्रिय पूजा पाल ने भी पार्टी से दूरी बना रखी है। पार्टी में पीडीए को लेकर हुई बगावत से अखिलेश यादव ने कुछ सबक जरुर लिए, जिसकी झलक टिकट वितरण में साफ दिखाई पड़ी। उन्होंने टिकट वितरण में यादव और मुस्लिम परस्त होने से बचने का प्रयास किया। 63 सीटों में मात्र 05 यादव, जो उनके परिवार के थे और 04 मुस्लिमों को टिकट दिए जबकि यादव से इतर अन्य पिछड़ी जातियों को 27 और दलितों को 17 टिकट दिया। सवर्ण खाते में मात्र 05 टिकट आए। सपा ने इस बार कुर्मी वोटरों को साधने का पूरा प्रयास किया, उन्होंने 10 प्रत्याशी पटेल खड़ा किया, जिसमें से 07 चुनाव जीतने में सफल रहे। यादव के बाद कुर्मी सबसे बड़े वोटर है।

एक प्रयास और किया कि भाजपा के पटेल प्रत्याशी के विरुद्ध पटेल न उतारा जाए। इसका असर यह हुआ कि 2014 और 2019 में भाजपा के कोर वोटर माने जाने वाले कुर्मी, कुशवाहा, मौर्या ने सपा के जातीय समीकरण के बुने जाल में फंस कर भाजपा से किनारा कर लिया। भाजपा के नामधारी नेताओं और मंत्रियों ने उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास तक नहीं किया, जिसका परिणाम सामने है। मतदाताओं में एक बड़ा प्रतिशत युवाओं का है, जिनमें अधिकांश बेरोजगार हैं। वह अपनी बेरोजगारी के लिए सरकार को जिम्मेदार मान रहे हैं। सपा गठबंधन ने बेरोजगारी और पेपर लीक को मुद्दा बना कर युवाओं के साथ उनके परिजनों को अपनी ओर आकर्षित किया। केवल सिपाही भर्ती पेपर लीक से 50 लाख से अधिक युवा प्रभावित हुए। यदि उनके परिवार को जोड़ लिया जाए तो यह संख्या करोड़ से आगे जाएगी।

भाजपा सरकार इस मुद्दे पर अपना प्रभावी पक्ष नही रख पाई। पेपर लीक के दोषियों पर हो रही कार्यवाही की खबर से अभ्यर्थी संतुष्ट नही हुए। इसी प्रकार किसानों, मजदूरों से जुड़े मुद्दे, दैनिक उपयोग की वस्तुओं की मंहगाई, खाद, बीज, दवाओं की बढ़ती कीमतों के बाद भी समय पर उपलब्ध न होने का मुद्दा, गरीबों को मिलने वाले 05 किलो राशन को 10 किलो करने वादा, 8,500 रुपये प्रतिमाह खटाखट देने का वादा जैसे मुद्दों ने मतदाओं को समाजवादी पार्टी की ओर आकर्षित किया भाजपा द्वारा संविधान संशोधन के लिए 400 पार के बयान को सपा गठबंधन ने पिछड़ों और दलितों के आरक्षण समाप्ति से जोड़ दिया। इस अफवाह ने जलती आग में घी डालने का काम किया। भाजपा के जनप्रतिनिधि और कार्यकर्ता यहां भी अपने मतदाताओं का ब्रेनवॉश नहीं कर सके। यद्यपि अखिलेश गठबंधन के अच्छे प्रदर्शन के पीछे देखा जाए तो कुछ भी नया नही था उनके पास बताने के लिए न तो कोई उपलब्धियां थी और न कोई विजन।

राहुल गांधी ने उप्र में प्रचार के बीच ऐसी किसी जनकल्याण योजना का जिक्र नहीं किया, जो कांग्रेस शासित राज्यों में बहुत चर्चित हो रही हों। बस गठबंधन जातीय समीकरण, मंहगाई, बेरोजगारी, आरक्षण जैसे मुद्दो के प्रति अपनी छद्म संवेदनशीलता प्रदर्शित कर प्रदेश में सत्ता विरोधी भावना पैदा करने में सफल साबित हुई और भाजपा के जनप्रतिनिधि से लेकर कार्यकर्ता तक उदासीन रहे और राम से लेकर मोदी और योगी के सहारे जीत की उम्मीद लगाये बैठे रहे। सपा गठबंधन के प्रभावशाली होने का एक बड़ा कारण बसपा से उसके कोर दलित वोटो का किनारा भी रहा। टिकट बंटवारे में मुस्लिमों को तरजीह दिया गया, लेकिन मुस्लिम इस बार बसपा से दूर रहे। आरक्षण समाप्ति के आसन्न खतरे से भयभीत दलितों को गठबंधन से, विशेष रुप से कांग्रेस से सहारे की उम्मीद लगी और दलितों में पासी समाज का एक बड़ा वर्ग, जो अब तक भाजपा के साथ था, वह भी सपा-कांग्रेस की ओर आकर्षित हुआ। बसपा के मुस्लिम और दलित वोटों के इस ध्रुवीकरण का लाभ भी इंडी गठबंधन को मिला।

जनप्रतिनिधियों-कार्यकर्ताओं का घटता कद

सपा गठबंधन की सफलता के साथ जिस दूसरी बात पर चर्चा हो रही है, वह है भाजपा के जनप्रतिनिधियों से लेकर बूथ लेबल कार्यकर्ताओं की उदासीनता या यह कहा जाए कि भाजपा कार्यकर्ता कहीं भी संघर्ष करते नही दिखे। सवाल उठता है आखिर क्यों ? दरअसल दूसरे दलों की सरकार आती है तो उनके कार्यकर्ताओं के काम धड़ाधड़ होते हैं लेकिन भाजपा के काल में ऐसा नही है। यह तथ्य प्रचारित है कि उप्र में भाजपा में शक्ति का ऐसा केन्द्रीयकरण है कि विधायक तक की बात निचले स्तर तक के अधिकारी नहीं सुनते हैं फिर कार्यकर्ताओं की क्या बिसात ? विधायकों सहित तमाम जनप्रतिनिधियों को अपने कार्यों के लिये मुख्यमंत्री के सचिव, प्रमुख सचिव और अपर सचिव पर निर्भर रहना पड़ रहा है।

पार्टी में कार्यकर्ताओं की भूमिका और महत्व कम होने से मतदाताओं से सम्पर्क की कड़ी टूट गई। जिसके कारण विरोधियों का कोई झूठ, दुष्प्रचार बहुत ही आसानी से स्थापित हो जा रहा है। इस चुनाव में यही हुआ और इसकी आहट 2022 के चुनाव में मिल चुकी थी जब प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा की सीटें 325 से घट कर 255 हो गई थीं। अब उप्र में 2024 का जनादेश प्रदेश में सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए बहुत शुभ संकेत नही दे रहा है, जिससे निपटने के लिए भाजपा नेतृत्व को अब नए सिरे से जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं के साथ बैठ कर अपनी रणनीति और राजनीति पर मंथन करना होगा।

हरि मंगल