Lok Sabha Elections: नौ चुनाव जीतने वाली कांग्रेस ने क्यों छोड़ दिया यहां का मैदान

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Lok Sabha Elections, सुल्तानपुर: लोकसभा चुनाव 2024 के लिए नेताओं ने कमर कस ली है। पार्टी ने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी करना शुरू कर दिया है। दावेदारों की धड़कनें बढ़ गई हैं। गोटी को फिट करने के लिए नेता लॉबिंग में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। सुल्तानपुर संसदीय सीट के लिए अभी तक किसी भी दल ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं।

प्रत्याशियों के सामने आने के बाद ही नतीजों को लेकर अटकलें लगेंगी। दिलचस्प बात यह है कि एक उपचुनाव समेत नौ चुनावों में यह सीट जीतने वाली कांग्रेस के पास इस बार चुनाव में कोई उम्मीदवार नहीं होगा, क्योंकि गठबंधन में यह सीट सपा के पास चली गई है।

इस सीट पर सपा अब तक छह बार चुनाव लड़ चुकी है। उन्होंने बाहरी और स्थानीय दोनों तरह के उम्मीदवारों का इस्तेमाल किया। लेकिन कभी सफलता नहीं मिली। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने एसपी पर भरोसा किया और यह सीट उनके लिए छोड़ दी। अब तो वक्त ही बताएगा कि इस बार सुल्तानपुर की जनता किस पार्टी और नेता को विजयी बनाएगी। हालांकि पिछले दो चुनाव 2014 में बीजेपी के वरुण गांधी यहां से जीतकर दिल्ली पहुंचे थे।

वहीं 2019 के चुनाव में बीजेपी ने इस सीट पर उनकी मां को टिकट देकर मैदान में उतारा था। वह जीतकर संसद भी पहुंचीं। इस तरह सुल्तानपुर लोकसभा सीट पर पिछले दो बार से लगातार बीजेपी का कब्जा है। अगर सपा-कांग्रेस गठबंधन के बाद भी इस सीट पर बीजेपी उम्मीदवार जीतता है तो हैट्रिक बनाने का रिकॉर्ड भी उसके खाते में जुड़ जाएगा।

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बीजेपी को पहली सफलता 1991 में सुल्तानपुर में अयोध्या के संत विश्वनाथ दास शास्त्री की जीत के साथ मिली। शास्त्री को 1,73,485 वोट मिले और निकटतम प्रतिद्वंद्वी जनता दल के राम सिंह को 64,529 वोट मिले। 1996 और 1998 में भाजपा के उम्मीदवार देवेन्द्र बहादुर राय थे, जो बाबरी विध्वंस के समय फैजाबाद के पुलिस अधीक्षक थे। 1996 में श्री राय को 2,38,843 वोट मिले थे और उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी सपा के कमरुज्जमा फौजी को 1,20,559 वोट मिले थे। 1998 में श्री राय के वोट 2,69,9510 और रीता बहुगुणा जोशी सपा के वोट 2,05,5030 थे।