चला गया एक भारतवंशी हिन्दी सेवी

मॉरीशस के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति रहे अनिरुद्ध जगन्नाथ का निधन पड़ोसी देश के एक राजनेता भर का इस दुनिया से चले जाना नहीं है। भारत और मॉरीशस के मध्य द्विपक्षीय सम्बंधों को प्रगाढ़ बनाने में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें अपना विशिष्ट नागरिक सम्मान ‘पद्मविभूषण’ प्रदान किया था। आज भारत के लोग उनके निधन से दुखी हैं। खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश के वे परिवार जगन्नाथ से अपना नाता जोड़कर गर्वपूर्ण दुख में डूबे होंगे। आखिर उनके पूर्वज कभी गिरमिटिया बनकर मॉरीशस जैसे देश में गए और धीरे-धीरे अपनी लगन और सेवा के बूते वहां के नियामक बन गये।

बलिया जिले के रसड़ा में अठिलपुरा गांव के कुछ यदुवंशी परिवार तो जगन्नाथ के जाने पर परम्परागत शोक में होंगे। अनिरुद्ध जगन्नाथ इसी गांव के विदेशी यादव के पुत्र थे। तब गाजीपुर जिले का हिस्सा रहे इस गांव से 1873 में 36 लोग गन्ना खेत-मजदूर के रूप में मॉरीशस गये थे। तब अन्य पड़ोसी और बिहार के सीमावर्ती जिलों से भी ऐसे लोगों के जाने का सिलसिला बना। तब से ऐसे परिवारों ने मॉरीशस में रहते हुए अपने मूल देश भारत, भारतवंशियों और हिन्दी के लिए बहुत कुछ किया है।

यहां अनिरुद्ध जगन्नाथ की हिन्दी सेवा को याद करना अभीष्ट है। याद करना होगा कि 12 मार्च, 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा मॉरीशस के प्रधानमंत्री अनिरुद्ध जगन्नाथ ने मॉरीशस में विंश्व हिन्दी सचिवालय के मुख्यालय के लिए शिलान्यास किया था। इसके पहले 11 फरवरी, 2008 से मॉरीशस के मोका गांव में अस्थायी सचिवालय का शुभारम्भ हुआ था। इसके पहले 1996 में त्रिनिदाद एवं टोबेगो में हुए पाँचवें हिंदी विश्व सम्मेलन के बाद मॉरीशस सरकार ने इसके निर्माण से संबंधित कार्यवाहियों के लिए डॉ. सरिता बुधु को सलाहकार नियुक्त किया था। इसकी प्रेरणा तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिली थी। तब एक नवंबर, 2001 को मॉरीशस सरकार द्वारा फेनिक्स में दी गयी भूमि पर भारत के तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी और मॉरीशस के वित्त मंत्री पोल रेमो बेरान्जे भी एक समारोह में शामिल हुए थे।

जिस भवन का 2015 में नरेन्द्र मोदी और अनिरुद्ध जगन्नाथ ने शिलान्यास किया था, उसका भव्य समारोह में 13 मार्च, 2018 को उद्घाटन हुआ। संयोग देखिए कि अनिरुद्ध जगन्नाथ के पुत्र और वर्तमान प्रधानमंत्री प्रविंद कुमार जगन्नाथ की उपस्थिति में भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इसका उद्घाटन किया। पिता अनिरुद्ध की तरह पुत्र प्रविंद कुमार जगन्नाथ भी हिन्दी के प्रति बेहद अनुराग रखते हैं।

मॉरीशस का इतिहास प्रवासी भारतीयों के बिना पूरा नहीं होता। इस देश के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले शिवसागर रामगुलाम के पूर्वज भी बिहार के भोजपुर के रहने वाले थे। स्वाभाविक है कि इस संपूर्ण भोजपुरी भूभाग से सम्बंध रखने वाले वंशज अपनी संस्कृति के साथ मातृ बोली भोजपुरी और हिन्दी को अपने सीने में संजोये रहे। यह प्रेरणा उन्हें अपने पूर्वजों के साथ लाए रामचरित मानस जैसे ग्रंथ से मिलती रही। यही कारण है कि जब भारत की पहल से विश्व हिन्दी सम्मेलन और प्रवासी भारतीय सम्मेलन प्रारम्भ हुए, दोनों में ही मॉरीशस सबसे पहले आगे आया। विश्व भोजपुरी सचिवालय के निर्माण में भी भारत का धन और मॉरीशस की जमीन का योगदान इसका प्रमाण है।

यूं तो विश्व हिन्दी सम्मेलन का सिलसिला 1975 में भोपाल से शुरू हुआ, परन्तु राष्ट्रभाषा के प्रति विशेष अनुरागी अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे और अधिक प्रखर किया। भोपाल के बाद दूसरा सम्मलेन मॉरीशस ने पोर्ट लुइस में कराया। वैसे तो ऐसे सम्मेलनों की जगह त्रिनिदाद-टुबैगो और सूरीनाम के साथ यूके, यूएसए और दक्षिण अफ्रीका भी बने। संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को कामकाज की भाषा बनाने का जो प्रयास अटल जी ने शुरू किया, उसमें अनिरुद्ध जगन्नाथ का भी योगदान है। इस तरह हिन्दी और प्रवासी भारतीयों यानी भारतवंशियों को एक साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए। यहां उल्लेख करना जरूरी है कि ‘प्रवासी भारतीय’ की जगह ‘भारतवंशी’ संज्ञा हिन्दी पक्षधर और कानूविद् लक्ष्मीमल्ल सिंघवी ने दी।

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विदेशों में रह रहे भारतवंशियों का हिन्दी के प्रति लगाव वहां के राष्ट्र नायकों के कारण भी आगे बढ़ता रहा। इसमें मॉरीशस का योगदान विशिष्ट है। कुछ तो है कि जहां अनिरुद्ध जगन्नाथ को भारत का नागरिक सम्मान मिला, तो वहां के साहित्यकार अभिमन्यु अनत को भारत की साहित्य अकादमी ने सम्मनित करने के साथ अपना मानद सदस्य भी बनाया। मॉरीशस में हिन्दी लेखकों की परंपरा आज बहुत समृद्ध है। कुछ विशिष्ट लेखकों में रामदेव धुरंधर, पूजानंद नेमा, भानुमति नागदान, धनराज शंभु, कृष्ण लाल बिहारी, ब्रजेन्द्र कुमार भगत ‘मधुकर’, सोमदत्त बखोरी, हरीनारायण सीता, ठाकुरदत्त पाण्डेय, मुनीश्वरलाल चिन्तामणि के नाम उदाहरण भर हैं। यह सूची अति विस्तृत है। निश्चित ही इस सूची में भारतवंशियों का अपनी भाषा से लगाव झलकता है। फिर भी इसे बढ़ाने में 52 साल के आजाद देश मॉरीशस में 18 वर्ष तक प्रधानमंत्री और करीब नौ साल तक राष्ट्रपति रहे अनिरुद्ध जगन्नाथ का योगदान अविस्मरणीय है।

डॉ. प्रभात ओझा