हरिद्वार तीर्थ की महिमा

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Haridwar, नारद पुराण के अनुसार राजा भागीरथ के रथ के पीछे चलने वाली अलकनंदा गंगाजी सहस्रों पर्वतों को विदीर्ण करती हुई जहां भूमि पर उतरी हैं, जहां पूर्व काल में दक्ष प्रजापति ने यज्ञेश्वर भगवान विष्णु का भजन किया है, वह पुण्यदायक क्षेत्र ही हरिद्वार या गंगाद्वार है, जो मनुष्यों के समस्त पातकों का नाश करने वाला है। प्रजापति दक्ष के उस यज्ञ में इन्द्रादि सब देवता बुलाये गये थे और वे सब अपने-अपने गणों के साथ यज्ञ में भाग लेने की इच्छा से वहां आए थे। उसमें देवर्षि, शिष्य, प्रशिष्यों सहित शुद्ध अंतःकरण वाले ब्रह्मर्षि तथा राजर्षि भी पधारे थे। पिनाकपाणि भगवान शंकर को छोड़कर अन्य सब देवताओं को निमंत्रित किया गया था। वे सब देवता विमानों पर बैठकर अपनी प्रिय पत्नियों के साथ दक्ष प्रजापति के यज्ञोत्सव में जा रहे थे और प्रसन्नतापूर्वक उस उत्सव का आपस में वर्णन भी कर रहे थे। कैलाश पर रहने वाली देवी सती ने उनकी बातें सुनीं, सुनकर वे पिता का यज्ञोत्सव देखने के लिए उत्सुक हुईं। उस समय सती ने महादेव जी से उस उत्सव में चलने की प्रार्थना की। उनकी बात सुनकर भगवान शिव ने कहा, हे देवी! वहां जाना कल्याणकर नहीं होगा, किन्तु सती जी अपने पिता का उत्सव देखने के लिए चल दीं। सती देवी वहां पहुंच तो गयीं, किन्तु किसी ने उनका स्वागत सत्कार नहीं किया। तब सती ने वहां अपने प्राण त्याग दिये।

अतः वह स्थान एक उत्तम क्षेत्र बन गया है। जो उस तीर्थ में स्नान करके देवताओं तथा पितरों का तर्पण करते हैं, वे देवी के अत्यंत प्रिय होते हैं। वे भोग और मोक्ष के प्रधान अधिकारी हो जाते हैं। तदनन्तर देवर्षि नारद से अपनी प्रिया सतीजी के प्राण त्याग का समाचार सुनकर भगवान शंकर ने वीरभद्र को उत्पन्न किया। वीरभद्र ने सम्पूर्ण प्रमथगणों के साथ जाकर उस यज्ञ का नाश कर दिया, फिर ब्रह्माजी की प्रार्थना से तुरंत प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उस विकृत यज्ञ को पुनः सम्पन्न किया। तब से वह अनुपम तीर्थ सम्पूर्ण पातकों का नाश करने वाला हुआ। उस तीर्थ में विधिपूर्वक स्नान करके मनुष्य जिस-जिस कामना का चिंतन करता है, उसे अवश्य प्राप्त कर लेता है। जहां दक्ष तथा देवताओं ने यज्ञों के स्वामी, साक्षात अविनाशी, भगवान विष्णु का स्तवन किया था, वह स्थान ‘हरि तीर्थ’ के नाम से प्रसिद्ध है। जो मानव उस हरि पद तीर्थ (हरि की पैड़ी) में विधिपूर्वक स्नान करता है, वह भगवान विष्णु का प्रिय तथा भोग और मोक्ष का प्रधान अधिकारी होता है।

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उससे पूर्व दिशा में त्रिगंग नाम से विख्यात क्षेत्र है, जहां सब लोग त्रिपथगा गंगा का साक्षात दर्शन करते हैं। वहां स्नान करके देवताओं, ऋषियों, पितरों और मनुष्यों का श्रद्धापूर्वक तर्पण करने वाले मनुष्य स्वर्ग लोक में देवताओं की भांति आनंदित होते हैं। वहां से दक्षिण दिशा में ‘कनखल तीर्थ’ है, वहां दिन-रात उपवास और स्नान करके मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। वहां जो विद्वान ब्राह्मण को गोदान देता है, वह कभी वैतरणी नदी और यमराज को नहीं देखता है। वहां किए गए जप, होम, तप और दान अक्षय होते हैं। वहां से पश्चिम दिशा में कोटि तीर्थ है, जहां भगवान कोटिश्वर का दर्शन करने से करोड़ों गुना पुण्य प्राप्त होता है और एक रात वहां निवास करने से पुण्डरीक यज्ञ का फल मिलता है। इसी प्रकार वहां से उत्तर दिशा में सप्तरंग (सप्त सरोवर) नाम से विख्यात उत्तम तीर्थ है। वह सम्पूर्ण पातकों का नाश करने वाला है। वहां सप्तऋषियों के पवित्र आश्रम स्थान हैं, उन सबमें स्नान और देवताओं एवं पितरों का तर्पण करके मनुष्य ऋषि लोक को प्राप्त होता है। राजा भागीरथ जब देव नदी गंगा को ले आये, उस समय उन सप्त ऋषियों की प्रसन्नता के लिए वे सात धाराओं में विभक्त हो गयीं। तब से पृथ्वी पर ‘सप्तगंग’ नामक तीर्थ विख्यात हो गया।

वहां से परम उत्तम कपिलाहूद नामक तीर्थ में जाकर जो श्रेष्ठ ब्राह्मण को गोदान करता है, उसे सहस्र गोदान का फल मिलता है। तदनन्तर शन्तनु के ललित नामक उत्तम तीर्थ में जाकर विधिवत स्नान और देवता आदि का तर्पण करके मनुष्य उत्तम गति पाता है, जहां राजा शांतनु ने मनुष्य रूप में आई हुई गंगा को प्राप्त किया और जहां गंगा ने प्रतिवर्ष एक-एक वसु को जन्म देकर अपनी धारा में उनके शरीर को डलवा दिया था, उन वसुओं का शरीर जहां गिरा वहां वृक्ष पैदा हो गया। जो मनुष्य वहां स्नान करता है और उस औषधि को खाता है, वह गंगा देवी के प्रसाद से कभी दुर्गति में नहीं पड़ता है। वहां भीम स्थल (भीमगोड़ा) में जाकर जो पुण्यात्मा पुरुष स्नान करता है, वह इस लोक में उत्तम भोग-भोगकर शरीर का अंत होने पर स्वर्गलोक में जाता है। जो इस क्षेत्र में वृहस्पति के कुंभ राशि पर और सूर्य के मेष राशि पर रहते समय कुम्भ स्नान करता है, वह साक्षात वृहस्पति और दूसरे सूर्य के समान तेजस्वी होता है।

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समस्त पातकों का नाश होता है। संक्रांति, अमावस्या, व्यतीपात, भुगादितिथि, अक्षय तृतीया आदि तथा किसी पुण्य दिन को जो मनुष्य श्रद्धा से वहां थोड़ा भी दान और स्नान करता है, वह कोटिगुना हो जाता है। जो मनुष्य दूर रहकर भी ‘हरिद्वार तीर्थ’ का स्मरण करता है, वह उसी प्रकार सद्गति पाता है, जैसे अंतकाल में श्री हरि को स्मरण करने वाला मनुष्य शुद्धचित्त होकर श्रद्धा से ‘हरिद्वार तीर्थ’ में जिस-जिस देवता का पूजन करता है, वह-वह देवता परम प्रसन्न होकर उसके मनोरथों को पूर्ण करता है। जो मनुष्य नियमपूर्वक रहकर तीनों समय स्नान करके वहां गंगा सहस्रनाम का पाठ करता है, वह अक्षय संतान का लाभ प्राप्त करता है। जहां गंगा भूतल पर आयीं, वह ‘हरिद्वार तीर्थ’ तपस्या का स्थान है। यही जप का स्थल है और यही होम का स्थल है। यहां स्नान, दान, जप, होम करने पर अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है और मनुष्य अपने मनोरथ को पाता है।

लोकेन्द्र चतुर्वेदी

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