नाशपाती की खेती में दिलचस्पी लें किसान, हो जाएंगे मालामाल


लखनऊः नाशपाती (pear) की खेती भारत में पर्वतीय, घाटी, तराई और भावर क्षेत्र तक में की जाती है। उत्तर प्रदेश में भी इसकी खेती की संभावनाएं बढ़ रही हैं। बस जरूरत इस बात की है कि कम सर्दी वाली किस्मों की खेती पर ध्यान दें। नाशपाती (pear) की खेती वैज्ञानिक तकनीक से की जाए, तो इसका लाभ यूपी के पश्चिम की तरह ही पूरब के किसान भी ले सकते हैं। जो फसलें हम ले रहे हैं, वह नाशपाती के साथ बो सकते हैं।

कई पहाड़ी प्रांत जैसे उत्तराखंड में ऐसी फसलें हैं, जो नाशपाती (pear) के साथ बोते आए हैं। नाशपाती की खेती के लिए मध्यम बनावट वाली बलुई दोमट तथा गहरी मिट्टी की आवश्यकता होती है। इस तरह की मिट्टी यूपी में है। ऐसी मिट्टी में जलनिकासी सरलता से होती है। समझने की बात यह है कि यहां की ज्यादा फसलें ऐसी हैं, जो खेतों में पानी भरने के कारण सड़ जाती हैं। ऐसे में नाशपाती के बागों से पानी निकालना काफी सरल है। खास बात यह है कि नाशपाती के बाग में खरीफ ऋतु में उड़द, मूंग, तरोई और रबी में गेहूं, मटर, चने या सब्जियां आदि फसलें बोई जा सकती हैं।

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नाशपाती की प्रमुख किस्म –

अर्ली चाइना, लेक्सटन सुपर्ब, बारटलैट, रैड बारटलै, मैक्स रैड बारटलैट, कलैप्स फेवरट, फ्लेमिश ब्यूटी, स्टारक्रिमसन, कान्फ्रेन्स, डायने ड्यूकोमिस, कश्मीरी नाशपाती, पत्थर नाख, कीफर, थम्ब पियर, शिनसुई, कोसुई, विक्टोरिया आदि हैं।

खाद और सिंचाई –

नाशपाती की खेती के लिए सेब की तरह ही उर्वरक तथा खाद डाली जाती है। इसकी खेती के लिए पूरे साल में 75 से 100 सेंटीमीटर वितरित बारिश की जरूरत होती है। रोपाई के बाद इसको नियमित पानी की आवश्यकता होती है। गर्मियों में 5 से 7 दिनों के फासले पर सिंचाई करंे।

यूपी है अच्छा बाजार –

नाशपाती (pear) की खेती में किसी प्रकार का टेंशन नहीं है। इससे जो फल जून के प्रथम सप्ताह से सितंबर के मध्य मिलते हैं, वह अन्य प्रांतों से लाए जाते हैं। पश्चिमी यूपी में इसके बगीचे है। लखनऊ में यह उत्तराखंड से या कश्मीर से लाकर बेचे जाते हैं। अन्य प्रांतों से लाने के बाद भी कई दिनों तक यह हरा रहता है। इससे यही कहा जा सकता है कि यदि यहां इसके पेड़ लगाए जाएं, तो इसके पकने तक इंतजार किया जा सकता है। यहां जो फल अभी बिकते हैं, वह कच्चे होते हैं। यूपी में इसकी अच्छी खपत है। नाशपाती के एक वृक्ष से एक से दो क्विटंल तक फल प्राप्त होता है। संभावना यह है कि नाशपाती उगाने से लेकर फल लेने तक के लिए यहां की मिट्टी काफी उपयोगी है।

  • शरद त्रिपाठी की रिपोर्ट

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