कोरोना कालः गंभीर होती अवसाद की समस्या

 

सुसाइड प्रिविंशन इन इंडिया फाउंडेशन की पिछले दिनों आई सर्वे रिपोर्ट न केवल गंभीर चेतावनी देती है अपितु देश में लोगों की बदलती मानसिकता को भी दर्शाती है। कोरोना के कारण लोग तेजी से अवसाद या यों कहें डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं। डिप्रेशन की समस्या हमारे यहां ही नहीं अपितु समूचे विश्व को आगोश में ले रही है। अंतर केवल यह है कि हमारे यहां डिप्रेशन के इलाज की जिस तरह की व्यवस्था या आधारभूत संरचना होनी चहिए वह अभी कोसों दूर है।

दुनिया में सबसे अधिक आत्महत्या करने वाले देशों में हमारा देश शुमार है। कोरोना के इस दौर में जिस तरह लोग अवसाद के शिकार हो रहे हैं वह गंभीर चिंता का विषय है। हालात यह है कि कोरोना अवसाद के कारण चिकित्सक तक मौत को गले लगाने में नहीं हिचक रहे हैं। पिछले दिनों कोविड सेंटरों पर आत्महत्या के मामले देश के अलग-अलग हिस्सों में देखने को मिले हैं। कोरोना ने एक तरह से सबकुछ हिलाकर रख दिया है। हालांकि दोष केवल कोरोना को ही नहीं दिया जा सकता। हां कोरोना के कारण डिप्रेशन के हालात बहुत अधिक बढ़े हैं।

दरअसल कोरोना का भय और शुरुआती दौर में दुर्भाग्य से कोरोना संक्रमित होने पर जिस तरह से उसे कोविड सेंटरों में आइसोलेट करने की तस्वीरें देखने को मिली है, उससे लोगों में दहशत और बढ़ गई है। शुरुआती दिनों में कोविड संक्रमितों को घर से ले जाने, फिर घर को सेनेटाइज करने और फिर आसपास के इलाके को सील करने की तस्वीरें डिप्रेशन बढ़ाने में सहायक रही है। इसके साथ ही कोरोना काल में लाॅकडाउन के दौरान घर में कैद होने और सभी आर्थिक गतिविधियों के ठप होने से रोजगार की समस्या ने भी लोगों में डिप्रेशन के हालात पैदा किए हैं। लाॅकडाउन में जो जहां था, वहीं बंद होकर रह गया। उद्योग- धंधे बंद हो गए। नौकरियों पर तलवार लटकी, कहीं नौकरी से निकालने का सिलसिला चला तो कहीं सैलेरी में कटौती या भत्तों में कमी हो गई। बहुत सारे ऐसे काम-धंधे हैं जो लाॅकडाउन हटने के बाद भी पटरी पर नहीं आ सके हैं। इनमें होटल्स, माॅल्स, सिनेमा, स्कूल, कोचिंग, टूरिज्म और इसी तरह के अन्य धंधे हैं, जिनके पटरी पर आने में समय लगेगा। देखा जाए तो कोरोना के कारण मेडिकल खासतौर से निजी चिकित्सालयों के हालात भी काफी बदल गए हैं। ऐसे में लोगों में डिप्रेशन आम होता जा रहा है।

पिछले दशकों में जिस तरह से हमारी संयुक्त परिवार व्यवस्था छिन्न-भिन्न होने लगी है, जिस तरह से रहन-सहन व जीवनशैली बदली है उससे डिप्रेशन के मामले कुछ ज्यादा ही तेजी से बढ़ने लगे हैं। पति-पत्नी दोनों के नौकरीपेशा होने, एक ही बच्चा होने, बच्चे के बचपन के स्थान पर प्रतिस्पर्धा में धकेलने और भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उधार संस्कृति डिप्रेशन के प्रमुख कारकों में शामिल हैं। घर, वाहन या अन्य के लिए लिए गए लोन की किस्तें तनाव का कारण बन रही हैं। आय के साधन सीमित होने की आशंका से भी तनाव व कुंठा बढ़ रही है। गलाकाट प्रतिस्पर्धा के चलते भविष्य को लेकर अधिक चिंता होने लगी है। व्यक्ति की सोच में बदलाव आने लगा है तो उसकी प्राथमिकताएं भी बदलने लगी है। दरअसल कोरोना ने सामूहिकता के स्थान पर व्यक्तिगतता को बढ़ावा दिया है। जिस एकाकीपन को सजा माना जाता था वह कोरोनाकाल में जीवन रक्षक बन गई है।

इंडियन साइक्रेटिक सोसायटी ने अपने अध्ययन में यह पाया है कि लाॅकडाउन मेें ढील के बाद भी लोगों के मन में भविष्य को लेकर अनिश्चितता और चिंता का भाव उन्हें डिप्रेशन की ओर धकेल रहा है। अप्रैल में किए गए एक सर्वें में शामिल लोगों में 40 फीसदी लोगों को अवसादग्रस्त पाया गया। हो सकता है यह अतिशयोक्तिपूर्ण फीगर हो पर चिंता व विचार का विषय अवश्य है। कोरोना के इस दौर में मनोचिकित्सकीय सुविधाओं के विस्तार की अधिक आवश्यकता है।

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विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो एक अनुमान के अनुसार 30 लाख लोगों पर एक मनोचिकित्सक व कुछ मनोवैज्ञानिक है वहीं अमेरिका में 30 लाख लोगों पर 100 मनोचिकित्सक व 300 मनोविज्ञानी है। यूरोपीय देशों में भी स्थिति में सुधार है तो इंग्लैण्ड ने इसके लिए अलग मंत्रालय व मंत्री बना दिया है ताकि डिप्रेशन के कारण आत्महत्याओं को रोका जा सके। लोगों की सही तरीके से काउंसलिंग हो सके। कोरोना के हालातों में अब दुनिया के देशों में मनोचिकित्सकों और मनोविज्ञानियों की अधिक आवश्यकता हो गई है और इस दिशा में विश्व स्वास्थ्य संगठन सहित देशों की सरकारों को ठोस प्रयास करने होंगे।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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