भाजपा की हार से कांग्रेस खुश

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देशभर में लोकसभा चुनाव पूरे जोर-शोर से संपन्न हो गए। 543 में से 292 सीटों के साथ एनडीए को जनादेश मिला है, लेकिन विपक्षी गुट भी कुछ पीछे नहीं रहा। जहां एनडीए को 292 सीटें मिलीं, तो वहीं इंडिया गठबंधन को 232 सीटें हासिल हुईं। बात अगर अकेले कांग्रेस की करें तो उनको 99 सीटों पर संतोष करना पड़ा। कांग्रेस अब 99 के फेर में फंस गई है। हालांकि कांग्रेस को दूसरे दलों की अपेक्षा सबसे ज्यादा 47 सीटों का फायदा हुआ है। अगर इंडिया गठबंधन की बात करें तो सीटों का आंकड़ा 232 है, जिसमें 133 सीटें गैर कांग्रेसी दलों की है।

हालांकि, बढ़ते वोट शेयर ने कांग्रेस के लिए संजीवनी का काम किया है। अब राहुल गांधी इसी जुगत में रहेंगे कि इस 99 के आंकड़े को बहुमत के जादुई आंकड़े 272 तक कैसे पहुंचाया जाए। यूपी में लोकसभा की 80 सीटों के परिणाम भाजपा को सदमे में डालने वाले रहे तो इसके पीछे कई कारण हैं। टिकट बंटवारे में गड़बड़ी और पांच वर्षों तक सांसदों की निष्क्रियता तो इस परिणाम के मुख्य कारण रहे ही, जातीय समीकरण को पहचानने में भी भाजपा से चूक हुई। इसके चलते भाजपा उन सीटों पर भी चुनाव हार गई, जहां से उसे जीत की शत-प्रतिशत उम्मीद थी। चुनाव के पहले चरण से ही पेपर लीक मामले को चुनावी मुद्दा बनाकर युवाओं को कांग्रेस व सपा ने अपने पक्ष में करना शुरू कर दिया था।

इस मुद्दे को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव सहित समूचे विपक्ष ने सातों चरणों में हर मौके पर उठाया। दूसरी ओर भाजपा ने इस मामले में अपना पक्ष रखने की भी जरूरत नहीं समझी। युवाओं में यह बड़ा फैक्टर बना और इसका नुकसान भाजपा को उठाना पड़ा। अग्निपथ योजना को भी विपक्ष बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने में सफल रहा, जिसकी काट भाजपा नहीं ढूंढ़ पाई। विपक्ष की ओर से उछाले गए संविधान बदलने और आरक्षण समाप्त करने के मुद्दे को भी भाजपा नहीं संभाल पाई। इसके अलावा टिकट वितरण में भी चूक हुई। मौजूदा 49 सांसदों को एनडीए ने चुनावी मैदान में उतारा।

इनमें से ज्यादातर सांसदों ने पांच वर्षों तक अपने-अपने लोकसभा क्षेत्रों में मतदाताओं से दूरी बनाए रखी। वह केवल मोदी के नाम पर इस बार भी चुनाव जीतने का सपना देख रहे थे। मुफ्त अनाज योजना सहित केंद्र की अन्य योजनाओं से मतदाता जरूर प्रभावित थे, लेकिन कांग्रेस ने पांच की बजाय 10 किलो अनाज मुफ्त में देने की घोषणा कर भाजपा को पीछे धकेल दिया। सपा की आटा व डाटा मुफ्त देने की योजना का असर भी मतदाताओं पर हुआ। महिलाओं को 1,00,000 देने वाले आश्वासन भी कारगर साबित हुआ। अनुमान के अनुसार लोगों की भावनाओं से जुड़े राम मंदिर के मुद्दे से भाजपा को काफी उम्मीदें थीं। अधिकतर सीटों पर प्रचार के दौरान राम मंदिर के मुद्दे को भाजपा ने उठाया भी, लेकिन इसका चुनावी लाभ पार्टी को नहीं मिल सका। भाजपा ने बूथ प्रबंधन के प्रयास सबसे पहले शुरू किए थे, लेकिन जमीनी स्तर पर यह उतर ही नहीं सका। 1.6 लाख बूथों में सभी पर भाजपा ने प्रभारी तैनात किए थे। इनका प्रशिक्षण भी करवाया गया था। दूसरी ओर कांग्रेस केवल 80 हजार बूथों पर ही अपने प्रभारी तैनात कर पाई थी लेकिन वे सक्रिय रहे।

भाजपा ने इस बार चुनाव जीतने के लिए पन्ना प्रमुखों की भी तैनाती की थी। वोटर लिस्ट के हिसाब से हर पन्ने का प्रभारी बनाया गया था। इस चुनाव में भाजपा का यह प्रयोग भी पूरी तरह से सफल नहीं साबित हुआ। अमित शाह से लेकर संगठन के स्तर पर पन्ना प्रमुखों से काफी उम्मीदें लगाई गईं थीं कि यह मैनेजमेंट चुनाव जीत का बड़ा हथियार साबित होगा, लेकिन प्रमुख लोगों को मतदान केंद्रों तक न ला सके। अभी जो डेटा हैं, उन्हें देखते हुए भाजपा के प्रदर्शन में आई गिरावट का कोई कारण आसानी से ढूंढना जल्दबाजी होगी, फिर भी अगर बेरोजगारी और महंगाई लोगों के लिए मुद्दा हैं तो मध्य प्रदेश में भाजपा को सारी सीटें कैसे मिल गईं, जबकि यूपी में उसका प्रदर्शन बेहद खराब रहा। 06 महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी ने राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में जीत हासिल की थी फिर राजस्थान में परफॉर्मेंस इतनी जल्दी खराब क्यों हो गई ? ये सही है कि स्थानीय मुद्दे मायने रखते हैं, फिर भी इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए गहन विश्लेषण की जरूरत होगी।

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भाजपा का ओडिशा में ऐतिहासिक जीत मिली है, जहां वह पांच बार के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से सत्ता छीनने में सफल रही, लेकिन बंगाल में उसने अपनी काफी जमीन गंवा दी है। भाजपा कह रही है कि उसे दक्षिण में फायदा हुआ है लेकिन आंध्र प्रदेश में उसे अपने सहयोगियों टीडीपी और जन सेना पार्टी की बदौलत अधिक सीटें मिली हैं। केरल में वह एक सीट जीतने में कामयाब रही, लेकिन उसका कारण पार्टी के प्रत्याशी हैं। वह लोकप्रिय अभिनेता हैं, इसलिए यह कारनामा कर पाए। तमिलनाडु में एनडीए को एक भी सीट नहीं मिली। सिर्फ तेलंगाना में पार्टी को बड़ा फायदा हुआ है यानी दक्षिण में उसे लंबा रास्ता तय करना अभी बाकी है। लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के साथ ही राजग के दो प्रमुख सहयोगी दलों जनता दल यूनाइटेड (जदयू) और तेलुगू देशम पार्टी (तेदेपा) पर डोरे डालने की विपक्षी गठबंधन की कोशिशों के बीच दोनों दलों ने साफ किया है कि वे राजग के साथ हैं और साथ ही रहेंगे। अभी तो कोई खतरा नहीं दिखाई दे रहा है, लेकिन देखते हैं आगे होता है क्या।

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