पूर्वजों की आत्मा की शान्ति को कम से कम तीन त्रिपिंडी श्राद्ध जरूरी, जानें इसका महत्व

वाराणसीः भादो मास की पूर्णिमा तिथि सोमवार से 16 दिवसीय पितृपक्ष की शुरुआत हो गई। इसकी मान्यता आश्विन कृष्ण प्रतिपदा 21 सितम्बर मंगलवार से अमावस्या पितृ विसर्जन 6 अक्तूबर तक है। पितृ पक्ष के पहले ही दिन सोमवार को अनादि विमल तीर्थ पिशाचमोचन कुंड पर अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म करने के लिए श्रद्धालु अलसुबह से ही उमड़ पड़े। कुंड के सभी घाटों पर लोग पूरे श्रद्धा के साथ परिजनों संग पिंडदान,तर्पण और त्रिपिंडी श्राद्ध करते रहे। तर्पण और श्राद्ध कर्म से पितृदोष से मुक्ति के साथ पितरों की शांति भी होती है। पितरों का तर्पण न करने से उन्हें मुक्ति नहीं मिलती और उनकी आत्मा भी मृत्यु लोक में भटकती है। ऐसे में पितृपक्ष में पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण किया जाता है। पितरों के प्रसन्न होने पर घर में सुख शांति आती है। विमल तीर्थ पर श्राद्ध कर्म के बाद ही गया श्राद्ध का महत्व है।

पितृपक्ष में पूर्वजों का स्मरण और उनकी पूजा करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। पितृपक्ष में तीन पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता हैं। इन्हीं को पितर कहते हैं। दिव्य पितृ तर्पण, देव तर्पण, ऋषि तर्पण और दिव्य मनुष्य तर्पण के पश्चात् ही स्व-पितृ तर्पण किया जाता है। पितृपक्ष में अपने पितरों के निमित्त जो अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुरूप शास्त्र विधि से श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसके जीवन में सभी कार्य मनोरथ सिद्ध होते हैं और घर-परिवार, वंश बेल की वृद्धि होती है। पितृदोष के शमन के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है। सनातन धर्म में ये श्राद्ध कर्म सबके लिए है। पूर्वजों की आत्मा की प्रसन्नता के लिए कम से कम तीन बार त्रिपिंडी श्राद्ध अवश्य वंशजों को करना चाहिए। इससे अधिक बार भी कर सकते है। विमल तीर्थ पर श्राद्ध कर्म का इतिहास हजारों साल पुराना है। इस कुंड पर श्राद्ध कर्म का उल्लेख स्कंद महा पुराण में भी है। गरुड़ पुराण में भी लिखा है। पिशाचमोचन मोक्ष तीर्थ स्थल की उत्पत्ति गंगा के धरती पर आने से भी पहले से है। ये श्राद्ध कर्म काशी के अलावा कहीं और नहीं होता।

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त्रिपिंडी श्राद्ध पूर्वजों के अलावा बीमार व्यक्ति के लिए भी लाभदायी है। त्रिपिंडी श्राद्ध सिर्फ पूर्वजों की आत्मा की शान्ति के लिए नहीं किया जाता। अत्यधिक बीमार व्यक्ति के लिए भी किया जाता है। त्रिपिंडी श्राद्ध कर्म पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु की बाधाओं से मुक्ति दिलाता है तो असाध्य बीमारी को भी ठीक करता है। त्रिपिंडी श्राद्ध में तीन पीढ़ियों के पूर्वजों के लिए पिंड दान होता है। अगर पिछली तीन पीढ़ियों से परिवार में यदि किसी का भी बहुत कम उम्र में किसी कारण या दुर्घटना में निधन हो गया हो तो उनकी आत्मा की शांति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध होना चाहिए। त्रिपिंडी श्राद्ध में भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान रुद्र(शिव) की पूजा की जाती है।

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