मां दुर्गा की पूजा करने के बाद प्रतिमा का विसर्जन नहीं करते हैं किन्नर

कोलकाता: वैसे तो ईश्वर सभी के होते हैं, पर उनके बनाए इंसानों ने समाज में रंग, रूप, धर्म, लिंग आदि का भेद बड़े पैमाने पर किया है। आज तकनीक का हाथ पकड़कर मंगल तक का सफर कर चुकी मानवीय सभ्यता अभी भी तीसरे लिंग यानी किन्नर समुदाय को बराबरी का ओहदा देने से हिचकिचाती है। लेकिन मां जिनके संतान सारे हैं, वह कभी भेदभाव नहीं करतीं। इसी संदेश के साथ इस बार राजधानी कोलकाता में किन्नर समुदाय ने अनोखी दुर्गा पूजा आयोजित की है।

अमूमन पूरे देश में दशमी के दिन दुर्गा प्रतिमा का विसर्जन कर दिया जाता है लेकिन बाईपास के कालिकापुर में दशमी के दिन से ये दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन नहीं करते बल्कि उन्हें दोबारा सजाकर रखते हैं और उसी प्रतिमा की सालभर पूजा अर्चना करते हैं। यहां वैशाली दास, सोहिनी बराल, रूही, ऋत, अयन, शुभश्री आदि ने भी सप्तमी के दिन गंगा स्नान कर मां की आराधना भी शुरू की है। पूजा के संस्थापक और प्रोजेक्ट मैनेजरों में से एक सायंतनी बसाक ने बताया, “हम पूजा के लिए सब कुछ कर रहे हैं। हम में से चार परिवर्तित पुरुष और बारह परिवर्तित महिलाएं हैं। सायंति ने बताया कि 2017-20 गोखेल रोड स्थित दीदी के घर पर पूजा हुई। केंद्र सरकार ने देश भर में किन्नर लोगों के लिए 13 आश्रयों का आवंटन किया है। उनमें से एक पश्चिम बंगाल में है। ईएम बाईपास के बगल में इस दो मंजिला घर में 25 लोग रह सकते हैं।

संगठन की सचिव रंजीता सिन्हा पूरे देश में किन्नरों के लिए हुए आंदोलन में एक जाना-पहचाना नाम हैं। उन्होंने बताया, ‘हम मूर्तियों को विसर्जित करने में विश्वास नहीं करते। इसलिए हम दशमी के बाद मूर्ति की शुद्धि नहीं करते हैं। हमलोग फिर से मां दुर्गा को सजाते हैं और उनकी पूजा करते हैं। उन्होंने कहा कि हमने राज्य सरकार से अपील की है कि लिंग परिवर्तन करने वालों की इस पूजा को सार्वभौमिक मान्यता दी जाए। राज्य ने पूजा के लिए 50 हजार रुपये का अनुदान दिया है। उन्होंने बताया कि किन्नर लोग अर्ध-नारिश्वर में विश्वास करते हैं। इसलिए इस बार दुर्गा पंडाल में जो प्रतिमा स्थापित की गई है वह भी अर्धनारीश्वर की है। रंजीता सिन्हा ने बताया कि मैं जिसकी पूजा करती हूं, उसका त्याग कैसे करूं? इसलिए मैं हर साल उसी मूर्ति की पूजा करती हूं। यहां नवरात्र के अंत में बर्तनों को फेंक दिया जाता है। दशमी सिंदूर खेल के बाद मूर्ति को पुनर्व्यवस्थित किया जाता। फिर मूर्ति को एक किन्नर सदस्य को सौंप दिया जाता है। उनके घर में अगले एक साल तक इस मूर्ति की पूजा की जाती है। किन्नरों को समाज में उचित सम्मान न मिलने के सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि फिलहाल वह इस चर्चा में नहीं पड़ना चाहते बल्कि उत्सव का आनंद लेना चाहते हैं।

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यहां स्थापित मूर्ति को दो ट्रांसजेंडर कलाकारों अरी रॉय और वैशाली दास ने बनाया है। वे पिछले तीन साल से एक ही मूर्ति की पूजा कर रहे हैं। पूजा के नौ दिनों तक सारे लोग शाकाहारी रहते हैं और अन्य नियमों का पालन करते हैं। पूजा के दिन कुंवारी कन्या की पूजा करने के बाद जरूरतमंदों को भोजन कराया जाता है।

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