प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के 5 साल

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प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के 5 साल पूरे हो गए। इस योजना के तहत अबतक देशभर के 29 करोड़ किसानों ने जीवन बीमा कराया। हर साल 5.5 करोड़ इस योजना से आच्छादित हो रहे हैं। यह बताना मुनासिब होगा कि इसमें सर्वाधिक संख्या उत्तर प्रदेश के किसानों की है। इस योजना से उत्तर प्रदेश के 6.18 करोड़ किसानों ने पंजीकरण कराया है। केंद्र सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन में योगी सरकार सबसे आगे है।

यह कहने में शायद ही किसी को गुरेज हो कि उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के चार वर्ष किसानों के उत्कर्ष के रहे हैं। इन चार वर्षों में यहां किसानों के हित में कई बड़े निर्णय हुए हैं। चाहे 36 हजार करोड़ रुपए से 86 लाख किसानों का ऋण मोचन रहा हो या फिर उत्तर प्रदेश के 2.20 करोड़ किसानों को प्रधानमंत्री सम्मान निधि से लाभान्वित करना, योगी सरकार अग्रिम मोर्चे पर खड़ी नजर आती है। 1.56 करोड़ किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड बांटकर, 55 लाख किसानों को द मिलियन फार्मर्स स्कूल में प्रशिक्षण दिलाकर और राज्य में किसान समृद्धि आयोग का गठन कर योगी आदित्यनाथ ने यह साबित करने की कोशिश की है कि प्रदेश में सही मायने में डबल इंजन की सरकार चल रही है और इसमें किसानों का हित सर्वोपरि है।

हालांकि प्रधानमंत्री बीमा योजना से देशभर में आच्छादित होने वाले किसानों की यह संख्या अभी भी संतोषजनक नहीं है। देशभर में किसानों को सबसे कम एक समान प्रीमियम पर एक व्यापक जोखिम समाधान प्रदान करने के लिए यह योजना 13 जनवरी 2016 को आरम्भ की गई थी।सरकार को पता है कि बादलों को बांधकर खेती नहीं कि जा सकती। साल-दर-साल आने वाली आपदाओं से किसानों को भारी नुकसान होता रहता है। उनकी फसल नष्ट हो जाती है और वे कर्ज के मकड़जाल में उलझते चले जाते हैं। ऐसे में यह योजना उनके लिए किसी सुरक्षा कवच जैसी है। पिछले 5 साल में 90 हजार करोड़ के फसल नुकसान का भुगतान यह बताता है कि केंद्र सरकार किसानों की समस्याओं को लेकर बहुत गंभीर है। जिस समय दिल्ली की सीमाओं पर पंजाब और हरियाणा के किसान तीनों नए कृषि कानूनों को खत्म करने के लिए आंदोलन कर रहे हैं, ऐसे समय में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के पांच साल पूरे होना और प्रधानमंत्री और कृषि मंत्री द्वारा किसानों को बधाई देना आश्वस्त तो करता ही है कि सरकार और किसानों के रिश्तों पर जमी बर्फ पिघल रही है। मगर धीरे-धीरे। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस मामले में समिति गठित कर दी है। यह और बात है कि किसानों को उस समिति पर अभी यकीन नहीं हो पा रहा है।

ऐसा नहीं कि इससे पहले इस देश में फसल बीमा योजनाएं नहीं थीं लेकिन इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि इतनी पारदर्शी नहीं थीं। प्रधानमंत्री फसल बीमा न केवल स्वैच्छिक है बल्कि अत्याधुनिकी प्रौद्योगिकी से भी जुड़ी है। फसल नुकसान के दावों के त्वरित निस्तारण और फसलों के नुकसान के मूल्यांकन के लिए उपग्रहों का इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसे में लेटलतीफी की गुंजाइश वैसे भी नहीं रह जाती। किसानों को अधिक से अधिक इस योजना से जुड़ना और लाभान्वित होना चाहिए। योजना में किसानों को अकेले प्रीमियम नहीं भरना है बल्कि केंद्र और राज्य सरकार भी समान रूप से प्रीमियम के भुगतान में किसानों का साथ देती हैं। सरकार ने इस योजना की बीमित राशि 15100 रुपए से बढ़ाकर 40700 रुपए कर दी है। इससे तो किसानों को ही लाभ होगा।

कुछ राजनीतिक दलों का तर्क होगा कि किसान प्रीमियम कहाँ से भरेगा। सारी किस्त सरकार को ही भरनी चाहिए। सरकार ऐसा कर भी सकती है लेकिन इससे श्रम के प्रति सम्मान, सहभागिता और स्वाभिमान का भाव तिरोहित हो जाएगा जो किसी भी लिहाज से उचित नहीं। पूर्वोत्तर राज्यों में इस योजना की 90 प्रतिशत प्रीमियम सहायता केंद्र सरकार देती है।

देश के खेतिहर वर्ग के लिए एक अदद बीमा योजना की दरकार दशकों से रही है। पहली बार 1972 में सरकार ने एक फसल बीमा योजना लागू की थी, जिसकी गड़बड़ियों को सुधार कर 1985 में दूसरी योजना लागू हुई। इसके 15 साल बाद तीसरी योजना आई और फिर पिछले अनुभवों के आधार पर तमाम सुधार करते हुए नरेंद्र मोदी सरकार ने खरीफ 2016 से एक नई स्कीम प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की शुरुआत की। सरकार की ओर से दावा किया गया कि इस योजना में सभी खामियों को दूर कर दिया गया है।

इस योजना के नाम में प्रधानमंत्री जोड़ा जाना कई राज्यों और राजनीतिक दलों को नागवार गुजरा क्योंकि इसमें जो प्रीमियम सरकारों को देना है, उसमें राज्य और केंद्र की हिस्सेदारी आधी-आधी है। इसके कारण शुरू से ही कई राज्यों ने इस योजना का विरोध किया और कइयों ने इसमें शामिल होने से इनकार भी कर दिया था।

किसानों द्वारा सभी खरीफ फसलों के लिए केवल 2 प्रतिशत एवं सभी रबी फसलों के लिए 1.5 प्रतिशत का एक समान प्रीमियम का भुगतान किया जाना है। वार्षिक वाणिज्यिक और बागवानी फसलों के मामले में प्रीमियम केवल 5 प्रतिशत रखा गया है। शेष प्रीमियम जो 90 से 98 प्रतिशत तक है, उसका भुगतान सरकार द्वारा किया जा रहा है। ऐसे में इसपर राजनीति उचित नहीं है। योजना में बुवाई से पूर्व चक्र से लेकर कटाई के बाद तक फसल के पूरे चक्र को शामिल किया गया है, जिसमें रोकी गई बुवाई और फसल के बीच में प्रतिकूल परिस्थितियों से होने वाला नुकसान भी शामिल है।

बाढ़, बादल फटने और प्राकृतिक आग जैसे खतरों के कारण होनेवाली स्थानीय आपदाओं और कटाई के बाद होनेवाले व्यक्तिगत खेती के स्तर पर नुकसान को शामिल किया गया है। लगातार सुधार लाने के प्रयास के रूप में, इस योजना को सभी किसानों के लिए स्वैच्छिक बनाया गया था, फरवरी 2020 में इसमें सुधार किया गया। केंद्र सरकार की मानें तो कोविड लॉकडाउन में भी लगभग 70 लाख किसानों को 8741.30 करोड़ रुपये के दावों का भुगतान किया गया। पंजाब में इस योजना के शुरू होने के वक्त जब भाजपा गठबंधन वाली सरकार थी, तब भी और बाद में कांग्रेस के आने के बाद भी, पंजाब ने कभी इस योजना में हिस्सेदारी नहीं की।

बिहार ने भी खरीफ 2018 से ही इससे अपना हाथ खींच लिया था। खरीफ 2019 से पश्चिम बंगाल भी इससे अलग हो गया और रबी 2019-20 से आंध्र प्रदेश भी पीएमएफबीवाई का हिस्सा नहीं रहा। मौजूदा खरीफ सीजन में जिन और 4 राज्यों ने इस योजना से अपना हाथ खींच लिया, उनमें तेलंगाना, झारखंड, गुजरात और मध्य प्रदेश हैं।

जिन राज्यों में सबसे ज्यादा इन दोनों योजनाओं के तहत सबसे ज्यादा पंजीकरण हुए हैं, उनमें महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा और उत्तर प्रदेश शीर्ष पर हैं। यदि साल 2019-20 के खरीफ और रबी, दोनों सीजन में चुकाए गए कुल प्रीमियम की रकम देखें, तो यह 27298.87 करोड़ रुपये बैठती है जिसमें से किसानों ने 3786.72 करोड़ रुपये का भुगतान किया, जबकि केंद्र सरकार ने 11275.92 करोड़ रुपये और राज्यों ने 12236.24 करोड़ रुपये का भार वहन किया। केंद्र सरकार अगर किसानों से प्रधानमंत्री योजना से जुड़ने का आग्रह कर रही है तो वह उचित ही है। राज्यों का विरोध इसलिए भी है कि उन्हें अपने हिस्से की राशि देनी पड़ रही है तो वह इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को अपनी परेशानी बात सकती है।

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किसानों के मुद्दे पर असहयोग की राजनीति नहीं की जानी चाहिए। अपने अन्य खर्च घटाकर भी किसानों की मदद की जानी चाहिए। यही लोक धर्म भी है। श्रेय-प्रेय में कुछ नहीं रखा, जो भी काम करेगा, श्रेय तो उसे मिल ही जाएगा। वह कुछ न बोले बताए तो भी।

सियाराम पांडेय ‘शांत’