सुख, समृद्धि दायक है मकर संक्रांति का पर्व

124

 

आईपीके, लखनऊः इस बार मकर संक्रांति का पर्व बेहद फलदायी होगा। 14 जनवरी को श्रवण नक्षत्र में यह पर्व मनाया जाएगा। सुख, समृद्धि और शांति के सूचक इस पर्व का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। ऐसे में मकर संक्रांति पर्व की सही पूजन विधि और इसके मनाने की विधा का ज्ञान होना बेहद जरूरी है।

मकर संक्रांति पर्व का विशेष महत्व है। भारतीय ज्योतिष के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर हुआ परिवर्तन माना जाता है। मकर संक्रांति से दिन बढ़ने लगता है और रात्रि की अवधि कम हो जाती है। खगोलशास्त्रियों के मुताबिक, इस दिन सूर्य अपनी कक्षाओं में परिवर्तन कर दक्षिणायन से उत्तरायण होकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। जिस राशि में सूर्य की कक्षा का परिवर्तन होता है, उसे संक्रमण या संक्रांति कहा जाता है। इस प्रकार सूर्य राशि का मकर राशि में प्रवेश मकर संक्रांति कहलाता है। शास्त्रों में उत्तरायण की अवधि को देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन का देवताओं की रात्रि कहा गया है। देश के अलग-अलग हिस्सों में मकर संक्रांति के पर्व को भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है, लेकिन अपने यहां इसे खिचड़ी के नाम से जाना जाता है। इस दिन खिचड़ी खाने और खिचड़ी तिल दान देने का विशेष महत्व माना जाता है।

ये है महत्व

मकर संक्रांति को देवताओं का प्रभात काल माना जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, दान, जप, तप, श्राद्ध व अनुष्ठान आदि का विशेष महत्व है। इस पर्व पर किया गया दान सौ गुना होकर प्राप्त होता है। इस दिन घृत और कंबल के दान का भी विशेष महत्व है। शास्त्रानुसार इन वस्तुओं का दान करने वाला संपूर्ण भोगों का भोग कर अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है।

मकर संक्रांति की पौराणिक कथा

इस पर्व की कई पौराणिक कथाएं भी प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, इस दिन ही भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर असुरों का विनाश करनेे के लिए उनके सिरों को काट मंदरा पर्वत पर फेंका था। भगवान की इस विजय को मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन सूर्यदेव अपने पुत्र शनिदेव के घर जाते हैं। ऐसे में पिता और पुत्र के बीच प्रेम बढ़ता है। ऐसे में भगवान सूर्य और शनि की अराधना शुभ फल देने वाला होता है।

शुरू हो जाएंगे मांगलिक कार्य

इस बार 14 जनवरी को दोपहर 2 बजकर 5 बजे सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य के उत्तरायण होने के बाद खरमास का भी समापन होगा और मांगलिक कार्य आरंभ हो जाएगा। शास्त्रों के अनुसार, उत्तरायण की अवधि को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात के तौर पर माना जाता है। इस दिन तिल का दान करने का अत्यधिक महत्व है। सूर्य के उत्तरायण होने से मनुष्य की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है।